इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि । पहली नजर में यह मामला आपराधिक नहीं बल्कि दीवानी प्रकृति का नजर आता है। ऐसा लगता है कि इसे आपराधिक रंग देने का प्रयास हुआ है। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट की एकलपीठ ने धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े की आरोपित महिला याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत का लाभ दे दिया।

मामला सांवेर थाना क्षेत्र निवासी प्रेमलता यादव का है। फरियादी किरण यादव, लक्ष्मी यादव और अनिता द्वारा प्रेमलता के खिलाफ फर्जी वसीयत बनाकर उसके जरिए करोड़ों की जमीन हथियाने का आरोप लगाते हुए भादवि की धारा 420, 467, 468, 471, और 120-बी के तहत प्रकरण दर्ज करवाया था। अपनी गिरफ्तारी से आशंकित प्रेमलता ने एडवोकेट मनीष यादव के माध्यम से हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क रखे गए कि याचिकाकर्ता विधवा महिला है।

शिकायतकर्ता उसकी बेशकीमती जमीन हथियाना चाहते हैं। मृतक कन्हैयालाल याचिकाकर्ता के ससुर थे। उनकी मृत्यु 2004 में हुई थी। जीवनकाल में ही उन्होंने एक वसीयत की थी जिसमें उक्त जमीन याचिकाकर्ता के पति हीरालाल के नाम की थी। इसका विधिवत नामांतरण भी याचिकाकर्ता के पति ने 2010 में करवा लिया था। बाद में इस जमीन को लेकर कुछ विवाद उत्पन्न हुआ था। वसीयत के आधार पर 2015 में इसे लेकर एक वाद भी न्यायालय में प्रस्तुत किया था। इसकी जानकारी शिकायतकर्ताओं को भी थी, बावजूद इसके वे चुप रहे।

याचिकाकर्ता के पति हीरालाल की मृत्यु 2020 में होने के बाद शिकायतकर्ताओं ने याचिकाकर्ता के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज करवाया है जबकि वसीयत 15 साल पुरानी है। शिकायतकर्ताओं को वसीयत पर शंका थी तो उन्हें उसे निरस्त करवाने के लिए दीवानी दावा प्रस्तुत करना था। इस मामले में आपराधिक प्रकरण बनता ही नहीं है। तर्कों से सहमत होते हुए याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली।

Posted By: Sameer Deshpande

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