गजेन्द्र विश्वकर्मा, इंदौर। आइआइएफएल हुरून की एक हजार करोड़ से अधिक संपत्ति वालों की सूची में शामिल शहर के अग्रवाल कोल कार्पोरेशन प्राइवेट के विनोद अग्रवाल, राजरतन ग्लोबल वायर के एमडी सुनील चौरड़िया और ईकेआइ इंटरनेशनल सर्विसेस के मनीष डबकारा की सफलता की कहानी रोचक है। छोटे से रूप में शहर में व्यवसाय की शुरुआत करने के बाद धीरे-धीरे देश में अपना नाम स्थापित किया और इस समय दुनियाभर के कई शहरों में वे सेवाएं दे रहे हैं। उद्योगपतियों ने नईदुनिया से अपनी सफलता की कहानी साझा की।

गरीबी देखी, अब समाजसेवा पर ध्यान

विनोद अग्रवाल का जन्म 1963 में हरियाणा में हुआ था। जब वे तीन वर्ष के थे, तब इंदौर आ गए थे। कई वर्षों तक परिवार ने बहुत गरीबी देखी। कई बार दो वक्त के भोजन के लिए परिवार को परेशान होना पड़ता था। धीरे-धीरे इंडियन कोल ट्रांसपोर्ट की शुरुआत की। इसके बाद इंडियन कोल की ट्रेडिंग में आ गए। 1998 में जब इंपोर्ट कोल का चलन शुरू हुआ तो पहला जहाज गुजरात से इंपोर्ट किया। अब अग्रवाल कोल भारत के 18 पोर्ट से सालभर में 15 मिलियन टन कोल इंपोर्ट करती है। कंपनी भारत की दूसरी सबसे बड़ी कोल इंपोर्टर कंपनी है। कंपनी इंडोनेशिया, साउथ अफ्रीका और अमेरिका से कोल इंपोर्ट करती है। इससे भारत के दो हजार मध्यम वर्ग उद्योगों को लाभ मिल रहा है। लाजिस्टिक कीमत कम होने से उद्योग ज्यादा अच्छे से कार्य कर पाते हैं।

विनोद अग्रवाल ने बताया कि व्यवसाय करते समय हमें देश के कानून को ध्यान में रखना चाहिए। हम ऐसी योजनाओं पर काम करते हैं जिससे आम इंसान को भी लाभ पहुंचे। हमने स्वयं के साथ सैकड़ों कर्मचारियों और अधिकारियों के विकास का भी हमेशा ध्यान रखा है। चूंकि शहर से खास जुड़ाव है इसलिए यहां भी चिकित्सा क्षेत्र में कई सुविधाएं दे रहे हैं। चमेलीदेवी अग्रवाल ब्लड बैंक और डायग्नोस्टिक केंद्र तैयार किया है। यहां रोजाना हजारों यूनिट रक्त दान किया जाता है। गुरुजी सेवा न्यास के साथ चमेलीदेवी न्यास मेडिकल केंद्र बांबे अस्पताल के पास तैयार किया है। यहां मेडिकल सुविधाएं बहुत कम शुल्क में उपलब्ध करा रहे हैं। गायों के साथ अन्य पशुओं की चिकित्सा सेवा में भी योगदान दे रहे हैं। उज्जैन महाकाल में भी इस समय बड़े अन्नक्षेत्र का निर्माण कराया जा रहा है।

ईमानदारी से काम करते हैं तो समय साथ देता है

शहर के सुनील चौरड़िया लिस्ट में 389वें स्थान पर हैं। उनकी टायर बीड वायर का उत्पादन करने वाली राजरतन कंपनी आज भारत की अग्रणी और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है। 2008 में उन्होंने थाइलैंड में अपनी दूसरी फैक्ट्री की स्थापना की थी। थाइलैंड को दुनिया के टायर हब के रूप में पहचान कर यह उनका अग्रणी कदम था। दुनिया इसे पहचान पाती, उससे पांच साल पहले उन्होंने यह कर दिखाया। थाइलैंड में बीड वायर उत्पादन करने वाली राजरतन इकलौती कंपनी है। कंपनी ने सात साल में लगभग 6600 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। सुनील चौरड़िया सीआइआइ के साथ 2005 से जुड़े हुए हैं। वे सीआइआइ मध्यप्रदेश चैप्टर के 2006 में चेयरमैन रह चुके हैं। सुनील चौरड़िया का कहना है कि स्कूल और कालेज की पढ़ाई इंदौर से ही हुई है। शहरवासियों और कंपनी के कर्मचारियों और अधिकारियों की बदौलत हम यहां तक पहुंच पाए हैं। शेयर बढ़ने से कंपनी को लाभ हुआ है।मेरा मानना है कि ईमानदारी से काम करते हैं तो समय साथ जरूरत देता है। हमने 1995 में व्यवसाय शुरू किया था।

पर्यावरण की बेहतरी के लिए काम करना था मकसद

ईकेआइ एनर्जी सर्विसेस के फाउंडर मनीष डबकारा 459वें स्थान पर रहे हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग भोपाल से और मास्टर डिग्री देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के स्कूल आफ एनर्जी से पूर्ण की। मनीष ने बताया कि कालेज समय से ही रुझान था कि पर्यावरण की बेहतरी के लिए कुछ काम किया जाए। 2008 में 50 लाख रुपये की लागत से व्यवसाय की शुरुआत की। 2018 में हमने देखा कि 2020 के बाद कार्बन क्रेडिट को लेकर दुनियाभर काफी काम होने वाला है। इसके लिए हमने 16 देशों में टीम तैयार की। पिछले वर्ष हमारा टर्नओवर करीब 1800 करोड़ रुपये था। कार्बन क्रेडिट विकासशील देशों में तैयार होते हैं और विकसित देश इन्हें खरीदते हैं। एक कार्बन क्रेडिट का मतलब होता है एक टन कार्बन डाईआक्साइड। कार्बन उत्सर्जन कम करने में योगदान देने के लिए इसे कंपनियां खरीद लेती हैं और यह बता सकती हैं कि वे कार्बन उत्सर्जन कम करने में योगदान दे रही हैं। इंदौर नगर निगम में भी कचरे से खाद बनाकर हमने करीब नौ करोड़ रुपये की आय कराई है। कार्बन क्रेडिट के क्षेत्र में दुनिया की टाप- 5 कंपनी में हमारा नाम शामिल है। समाज के लिए भी कार्य कर रहे हैं। गांवों में कार्बन उत्सर्जन नहीं करने वाले चूल्हों का निश्शुल्क वितरण करा रहे हैं।

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