Uniform Civil Code इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। अभिभाषकों की संस्था न्यायाश्रय ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम ज्ञापन देकर मांग की है कि समान नागरिक संहिता तुरंत लागू की जाए। यह ज्ञापन इंदौर संभागायुक्त को सौंपा गया है। संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट पंकज वाधवानी ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी कई मौकों पर देश में समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की आवश्यकता बताई गई है। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई है। हाई कोर्ट ने कहा है कि देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है। धर्म और जाति के अंतर को समाप्त करने के लिए समान नागरिक संहिता लागू होना चाहिए। कानूनी क्षेत्र में काम करने वाली संस्था न्यायाश्रय ने इस संबंध में राष्ट्रपति और प्रदेश के राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया है।

समान नागरिक संहिता दमनकारी नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष प्रविधान है

एडवोकेट वाधवानी ने कहा है कि समान नागरिक संहिता देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान का धर्मनिरपेक्ष विचार है किंतु कुछ राजनीतिक दलों और कट्टरपंथियों द्वारा संकीर्ण मानसिकता दिखाते हुए इसे ऐसा बताया जाता है जैसे यह कोई दमनकारी प्रविधान हो। वास्तविकता में समान नागरिक संहिता सभी के लिए कल्याणकारी प्रविधान है। इसे लागू किया जाता है तो इससे न सिर्फ देश बल्कि प्रत्येक समुदाय का विकास होगा। कट्टरपंथी इस संहिता को सांप्रदायिक विचार बताते हैं लेकिन अमेरिका, चीन, इंडोनेशिया आदि देशों में समान नागरिक संहिता का पालन हो रहा है, जबकि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में इसे साम्प्रदायिक बताकर इसका विरोध होता रहा है।

यह है समान नागरिक संहिता

भारत के संविधान के भाग चार में राज्य के नीति निर्देशक तत्व दिए गए हैं। इस भाग में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों को किस दिशा में कार्य करना है इस बारे में निर्देश दिए गए हैं जो कि संविधान के अनुच्छेद 36 से 51 तक दर्शाए गए हैं। इनमें से कई अनुच्छेद तो लागू हो चुके हैं लेकिन अनुच्छेद 44 जिसमें राज्यों को यह निर्देश दिया गया है कि सरकार समान नागरिक संहिता लागू करें, वह आज तक लागू नहीं हुआ है। यही वजह है कि हमारे देश में अलग-अलग धर्म के पर्सनल ला चल रहे हैं। एक ही देश में फैमिली ला के अंतर्गत अलग-अलग रीति रिवाज चल रहे हैं। इसके चलते अलग-अलग धर्म में आस्था रखने वालों में मनमुटाव की आशंका बनी रहती है।

Posted By: Sameer Deshpande

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