लोकेश सोलंकी, इंदौर Tosi Injection Indore। रेमडेसिविर इंजेक्शन की किल्लत झेल रहे कोरोना के मरीजों को अब एक और इंजेक्शन की कमी का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना के उपचार में काम रहा इंजेक्शन टोसीलीजुमेब (टोसी) बाजार से गायब हो चुका है। इंदौर समेत प्रदेश के सभी बाजारों में इस इंजेक्शन का आपूर्ति पूरी तरह थम गई है। कोरोना पीड़ितों के पर्चे पर इस इंजेक्शन को लिखे जाने का चलन लगातार बढ़ रहा है। फिलहाल इस इंजेक्शन की किल्लत पर न तो प्रशासन का ध्यान गया है न ही सरकार का। इस इंजेक्शन के विकल्प के तौर पर लिखे जा रहे एक अन्य इंजेक्शन आइटोलीजुमेब पर दबाव बढ़ गया है। आसार है कि आने वाले दिनों में यह भी बाजार से गायब हो सकता है।

टोसी नाम से मिलने वाले टोसीलीजुमेब इंजेक्शन की कीमत 32 से 40 हजार रुपये के बीच है। चार-पांच दिन पहले तक बाजार में 32 हजार 700 रुपये की कीमत पर दवा बाजार में यह इंजेक्शन मिल रहा था। उस दौरान रेमडेसिविर बाजार से लगभग गायब हो चुका था। इसके बाद से कई मरीजों के पर्चे पर इस महंगे इंजेक्शन को लिखा गया। रेमडेसिविर नहीं था तो मजबूरी में मरीजों के स्वजनों ने विकल्प के तौर पर इस महंगे इंजेक्शन को खरीदना शुरू किया। इसके बाद धीरे-धीरे इस इंजेक्शन की मांग बढ़ने लगी और यह पूरी तरह बाजार से गायब हो गया।

मप्र केमिस्ट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष धर्मेंद्र कोठारी ने स्वीकार किया कि बाजार में शायद ही अब किसी भी दवा दुकान पर यह इंजेक्शन उपलब्ध हो। दरअसल यह इंजेक्शन देश में बनाया ही नहीं जाता। यह विदेशों से आयात होता है। सिप्ला कंपनी अब तक इस इंजेक्शन को उपलब्ध करवा रही थी। क्योंकि इंजेक्शन काफी महंगा था। 40 हजार में बिकने वाले इस इंजेक्शन को दवा व्यापारियों ने कोरोना मरीजों की जरूरत देखते हुए 34 से 37 हजार के बीच ही बेचा।

प्रशासन से भी निर्देश थे कि दवाओं पर दस प्रतिशत से ज्यादा मुनाफा न लें। तो दुकानदारों ने महंगे इंजेक्शन के चलते पांच प्रतिशत मार्जिन पर ही इसे उपलब्ध करवा दिया। अब कंपनी के डिपो से लेकर स्टाकिस्ट तक के पास इस इंजेक्शन का एक भी वायल नहीं बचा है। व्यापारियों को भी नहीं पता है कि असल में दिक्कत कहां है। हालांकि लोग इसकी मांग और पर्चे लेकर आ रहे हैं।

इंदौर केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय बाकलीवाल के अनुसार यह सही है कि तीन दिन पहले मिल रहा टोसी अब बाजार से गायब है। सूचना मिली है कि चेन्नई पोर्ट से इस आयातित इंजेक्शन की आपूर्ति देश में होती है। वहां से आपूर्ति बाधित होने की जानकारी मिल रही है। सरकार को इस बारे में ध्यान देते हुए उचित कदम उठाना चाहिए।

सोरायसिस का इंजेक्शन

केमिस्ट धर्मेंद्र कोठारी के अनुसार आइटोलीजुमेब असल में सोरायसिस के उपचार में काम आने वाला इंजेक्शन है। यह टी सेल के इनफिल्ट्रेशन को कम करता है। इससे अंदरुनी अंगों से सूजन जैसे लक्षणों में आराम मिलता रहा। असल में गंभीर कोविड मरीजों को बीमारी के कारण होने वाली अन्य तकलीफों से राहत देने के लिए यह इंजेक्शन लिखा जा रहा है। चूंकि अभी कोविड की कोई दवा नहीं है ऐसे में अन्य तमाम बीमारियों में लक्षण के आधार पर राहत देने वाली दवाओं का उपयोग मरीजों पर किया जा रहा है।

डाक्टर पर्चे पर न लिखे रेमडेसिविर

केमिस्ट एसोसिएशन ने मांग की है कि डाक्टर मरीजों के पर्चे पर रेमडेसिविर लिखकर बाजार में न भेजें क्योंकि यह इंजेक्शन न दुकानों पर है न ही स्टाकिस्ट के पास। ऐसे में भर्ती मरीजों को अस्पतालों की फार्मेसी से ही यह उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। हो ये रहा है कि मरीजों के पर्चे पर लिखकर उन्हें बाजार में दौड़ाया जा रहा है। कुछ लोग अस्पतालों से ही इंजेक्शन की हेराफेरी कर उसे बाहर बेच रहे हैं। मरीज के स्वजनों को लगता है बाजार में इंजेक्शन ब्लैक हो रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेश सचिव राकेशसिंह यादव ने मुख्यमंत्री को शिकायत की है कि अस्पतालों का स्टाफ मरीजों को मिलने वाले रेमडेसिविर में से कुछ गायब कर बाहर ब्लैक कर रहा है।

Posted By: Sameer Deshpande

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