अनिल त्रिवेदी (इंदौर, नईदुनिया)।Valentine Day Special प्यार अधिक स्थायी भावना है जबकि आकर्षण एक खास समयांतराल के लिए होता है।

- प्यार जिम्मेदारी का एहसास कराता है जबकि आकर्षण अक्सर गैर-जिम्मेदार होता है।

- प्यार कुछ देने में सुख अनुभव करता है जबकि आकर्षण में कुछ पाने की भावना प्रबल होती है।

- प्यार में व्यक्ति ईर्ष्या महसूस नहीं करता है जबकि आकर्षण में व्यक्ति में ईर्ष्या की भावना होती है।

- प्यार में आनंद और संतोष की अनुभूति होती है जबकि आकर्षण में व्यक्ति विचलित रहता है।

- प्यार में व्यक्ति आधिपत्य नहीं जताता जबकि आकर्षण में व्यक्ति ऐसी भावना रखता है।

- प्यार में व्यक्ति ज्यादा व्यावहारिक होता है, जबकि आकर्षण में वो काल्पनिक जगत में होता है।

- प्यार मन और आत्मिक तल का रिश्ता है, जबकि आकर्षण तन का रिश्ता है।

- प्यार एक ऐसी स्थिति है जिसमें आप पार्टनर के साथ सुकून फील करते हैं जबकि आकर्षण में आप उसे पाने की हड़बड़ी में होते हैं।

प्यार और आकर्षण के ये चंद बुनियादी फर्क शहर के मनोविश्लेषक डॉ. संजीव त्रिपाठी ने साझा किए, ताकि 'वैलेंटाइन डे" के मौके पर अपने प्यार को इन पैमानों पर परखकर आप अंदाजा लगा सकें कि जिसे आप प्यार कह रहे हैं, वो कहीं महज क्षणिक आवेग या शारीरिक आकर्षण तो नहीं है? इससे आपको सही फैसला लेने में मदद मिलेगी और जिंदगी को सही दिशा मिलेगी, क्योंकि प्यार के फैसले का असर आपकी पूरी जिंदगी पर होता है। इसलिए प्यार करने से पहले प्यार को समझ लें। आकर्षण या आवेग को प्यार का नाम देने के बजाय प्यार को सिर्फ प्यार ही रहने दें।

सही वक्त पर लें सही निर्णय

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मस्तिष्क के एक खास हिस्से 'हाइपोथैलेमस" में जब न्यूरोट्रांसमीटर 'डोपेमाइन" और 'नोरपाइनफेरिन" की अधिक मात्रा हो जाती है तो शरीर में रोमांच की अनुभूति होने लगती है। ये न्यूरोट्रांसमीटर सामान्यत: मस्तिष्क में उस समय सक्रिय होते हैं, जब आप किसी अपोजिट जेंडर से मिलते हैं। आपको उसकी कोई बात आकर्षित करती है तो मस्तिष्क का ये हिस्सा सक्रिय हो उठता है, जिससे डोपेमाइन हार्मोन का स्तर बढ़ता है और दिमाग में आनंद, ऊर्जा तथा प्रेरणा के भाव उत्पन्ना होने लगते हैं। इससे आप सामने वाले के लिए खास एहसास से भर जाते हैं। लेकिन ऐसे में अगर आपको प्यार और आकर्षण का फर्क पता है तो ही सही वक्त पर सही निर्णय ले पाते हैं।

प्यार में होता है एक अलग एनर्जी लेवल

मनोविश्लेषक डॉ. संजीव त्रिपाठी के मुताबिक बिहेवियर साइकोलॉजी कहती है कि अगर आप किसी को रोज किसी खास समय देखने के अभ्यस्त हो गए हैं तो जब वो कभी नहीं दिखाई देता तो मन बेचैन हो उठता है। ये प्यार नहीं बल्कि आपकी आदत में शुमार हो चुकी प्रक्रिया है जिसके पूरा नहीं होने पर आपको अच्छा नहीं लगता है। आप जिससे प्यार करते हैं उसके लिए रिस्पांसिबिलिटी फील करते हैं। उसकी केयर करना चाहते हैं। भावना ये होती है कि वो खुश रहे। आप उससे इमोशनली जुड़ जाते हैं और उससे आपकी चाहत का एनर्जी लेवल बिलकुल अलग होता है। ऐसा आप कभी-कभार किसी को पहली नजर में देखने पर ही महसूस करने लग सकते हैं और कई बार लंबे समय तक साथ रहने के बाद आपको ये एहसास होता है।

रिलेशनशिप को वक्त दें

कई बार आप सिर्फ किसी की खूबसूरती देखकर उस पर रीझ जाते हैं। ये आकर्षण है। कई बार ये काफी लंबे समय तक रह सकता है तो कई बार ये क्षणिक आवेग साबित होता है। इसलिए प्यार और आकर्षण के फर्क को समझने के लिए रिलेशनशिप को थोड़ा टाइम दें, क्योंकि प्रेम इंतजार कर सकता है लेकिन आवेग जल्द से जल्द पाना चाहता है। प्रेम भरा हुआ मटका है और आवेग आधी भरी गागर, जिसके बारे में कहा जाता है कि 'अधजल गगरी छलकत जाए"।

घनिष्ठता, जुनून और समर्पण

मशहूर अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट रॉबर्ट स्टर्नबर्ग के हवाले से मनोविश्लेषक डॉ. पवन राठी बताते हैं कि दोस्त घनिष्ठ होते हैं लेकिन उनके लिए आपके मन में जुनूनी आकर्षण नहीं होता। इन दोनों से अलग है शादी, जिसमें आप जिम्मेदारी महसूस करते हैं। रही बात प्यार की तो उसमें दोस्तों जैसी इंटिमेसी भी होती है और अपने साथी को हर हाल में खुश रखने का जुनून भी। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कसौटी है समर्पण या कमिटमेंट, जो किसी रिश्ते को लंबे समय तक बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी है। इसलिए कदम आगे बढ़ाने से पहले देख लें कि आपका प्यार इन तीनों कसौटियों पर खरा है या नहीं?

अरेंज मैरिज से ज्यादा तलाक लव मैरिज में

डॉ. राठी के मुताबिक कई सर्वे और स्टडीज बताती हैं कि अरेंज मैरिज के मुकाबले लव मैरिज करने वालों के तलाक ज्यादा होते हैं। इसका कारण यही है कि वो जुनून को ही प्यार समझकर शादी तो कर लेते हैं, लेकिन जल्द ही वो जुनून खत्म हो जाता है और फिर शुरू होता है जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों को फेस करने का सिलसिला। यहां आकर तथाकथित लव मैरिज फेल हो जाती है, क्योंकि इसमें कमिटमेंट को लेकर न तो गंभीरता होती है और न ही मैच्योरिटी।

नए फीचर के फोन जैसा नहीं है प्यार

साइकोलॉजिस्ट डॉ. स्मिता अग्रवाल कहती हैं मार्केट में एक नया फोन आया और उसके फीचर्स देख आप उसे खरीदने के लिए लालायित हो उठे। लेकिन कुछ समय बाद जैसे ही बेहतर ऑप्शन मिला, आपका फोकस उस नए फोन पर शिफ्ट हो गया। अब आप कहेंगे कि नए फोन से आपको प्यार हो गया है। जी नहीं, ये अट्रैक्शन है जो हमेशा बेहतर की तलाश में रहता है। जबकि सच्चा प्यार आपकी पर्सनालिटी की खूबियों के साथ खामियों को भी अपनाता है। क्योंकि इसमें सामने वाला फिजिकल से ज्यादा आपसे इमोशनली और स्पिरिचुअली जुड़ा होता है। वो आपकी खूबियों को और उभारने की कोशिश करता है और खामियों को दूर कर आपको और बेहतर इंसान बनाता है। इसीलिए कई बार लोगों को लगता है कि किसी एक शख्स के आने से उनकी जिंदगी संवर गई। यही असल प्यार है। 'लव एट फर्स्ट साइट" या पहली नजर में प्यार के मामले भी होते हैं, लेकिन अधिकांशत: प्यार धीरे-धीरे एक दूसरे को समझकर परिपक्व होता है और शारीरिक आकर्षण से ऊपर उठकर आपको पूरी तरह अपनाता है।

Posted By: Hemant Upadhyay

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