History Of Indore: इंदौर। यूं तो गरबा आज पूरे देश-दुनिया के लिए जाना पहचाना नाम है लेकिन एक वक्त था जब यह गुजरात और उससे लगे हुए क्षेत्रों में ही किया जाता था। गुजरात के इस लोकनृत्य से शहर की मुलाकात 1927 में हुई। गुजरात से उद्योग-धंधे की तलाश में शहर आए लोगों ने पहले तो यहां अपने सपने साकार करना शुरू किए और जब उन्हें लगा कि गुजराती परिवारों के बच्चों को भी बेहतर शिक्षा मिले तो उन्होंने यहां शैक्षणिक संस्थान की शुरुआत की। विद्यालय-महाविद्यालय की शुरुआत के बाद अपनी कला, संस्कृति, साहित्य को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए गुजराती वाचनालय शुरू किया गया और फिर सांस्कृतिक आयोजन का क्रम शुरू हुआ जो आज तक बदस्तूर जारी है।

गुजरात से इंदौर आकर बसे गुजराती भाषियों ने सबसे पहले यहां के जेल रोड क्षेत्र में गरबे की शुरुआत की। उस वक्त एमजी रोड पर बाटा शू कंपनी स्टोर हुआ करता था जिसके पास वाली गली में गरबा करना शुरू किया। धीरे-धीरे जब समाजजन की इसमें आवाजाही बढ़ने लगी और यह स्थान छोटा लगने लगा तो गरबा जेल रोड के सोनारवाड़े में होने लगा। जब यहां भी स्थानाभाव होने लगा तो जेल रोड पर सरदार आइसक्रीम के पीछे बने चौक पर गरबा किया जाने लगा। पर जब यह स्थान बेच दिया गया तो गरबा खातीपुरा की लाल गली में होने लगा।

लालगली में आज जहां देवी का मंदिर है एक वक्त वहां खाली भूखंड था जिसे मंदिर के लिए प्राप्त करने के लिए 1985 में पंकज भाई देसाई ने परिवार सहित अनशन किया और उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया। हालांकि शाम को उनको रिहाई भी मिल गई पर इसके बाद समाज के लोगों ने तात्कालिक प्रशासन से यही स्थान पाने के लिए जुलूस निकालते हुए प्रदर्शन किया। कुछ शर्तें प्रशासन ने रखी और कुछ मांगे समाजजन ने। दोनों के बीच सहमति बनी और मंदिर के लिए जगह मिल गई। इसके बाद समाज के लोगों ने एकता का परिचय देते हुए यह मंदिर बनवाया और इसी स्थान पर आज भी गरबा होता है।

जिस समय गरबे की शुरुआत हुई थी तब शहर में बाहर से गायकों को या गरबा प्रशिक्षकों को बुलाने का चलन नहीं था ऐसे में गुजराती भाषी परिवारों ने ही इसकी पूरी जिम्मेदारी निभानी शुरू की। जिन्हें गाना आता था वे गायक बने, वादन के शौकीनों के हाथ में साज थमाए गए और जिन भी बालिकाओं और महिलाओं को गरबा करने में रुचि थी वे सब आगे आई और इस तरह शुरू हुआ लाल गली में गरबे का सिलसिला। इस परंपरा को निभाते हुए आज भी गुजराती गीतो से ही मां की स्तुति की जाती है और पारंपरिक शैली में ही गरबा होता है।

- चंद्रप्रकाश देसाई, अध्यक्ष, श्री गुजराती नवदुर्गा उत्सव मंडल लालगली

Posted By: Sameer Deshpande

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