हर्षल सिंह राठौड़, इंदौर। एक समय था जब शहर में मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी धूमधाम से मनती थी। कई दिनों पहले से इस पर्व की तैयारी शुरू हो जाती थी। मार्गशीर्ष माह की प्रतिपदा से शुरू होने वाली खंडोबा नवरात्र या चंपा षष्ठी नवरात्र की पूजा शुरू हो जाती थी। पहले राजवाड़ा, बाद में माणिकबाग और फिर समय के साथ चंपकेश्वर शिव मंदिर भी इस पूजा के साक्षी बने। पर अब सब कुछ बदल सा गया है।

जिस चंपकेश्वर शिव मंदिर के पास बनी चंपा बावड़ी के जल से अभिषेक कर यह उत्सव मनाया जाता था, वहां अब यह परंपरा अतीत का भाग बन गई है। जिस चंपा बावड़ी के जल से होलकर राजवंश की रानियां शिवलिंग का पूजन करती थीं, जो स्थान गर्मी के दिनों में शीतलता प्रदान करता था, वहां अब सन्नााटा पसरा रहता है।

लालबाग पैलेस के पहले से बनी यह चंपा बावड़ी और चंपकेश्वर शिव मंदिर अपनी खूबसूरती और स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना लिए आज भी होलकर शासनकाल की गौरवगाथा कहता नजर आता है, लेकिन अफसोस कि उसे सुनने कोई नहीं जाता। यह जरूर है कि योग साधक या मंदिर के समीप बने घरों में रहने वाले ही यहां पूजा करते हैं। आज चंपा षष्ठी है और यही वह दिन है, जब होलकर शासक अपने परिवार, सरदारों और सामंतों के साथ यहां पूजन करने आया करते थे।

इस बावड़ी और मंदिर का निर्माण उस समय हुआ, जब लालबाग पैलेस का भी अस्तित्व नहीं था। विक्रम संवत 1893 (ईस्वी सन 1836) में महाराजा यशवंतराव प्रथम के पुत्र मल्हारराव द्वितीय की स्मृति में जरूर इस बावड़ी और मंदिर का निर्माण हुआ लेकिन पुरातत्वविदों के अनुसार इसका नाता इस पर्व से भी रहा और इस दिन यहां विशेष पूजा की जाती थी।

होलकर राजवंश द्वारा की जाती थी पूजा

लालबाग पैलेस के प्रभारी अधिकारी डा. डीपी पांडे के अनुसार इस मंदिर में महाशिवरात्रि, चंपा षष्ठी आदि पर्व विशेष पर होलकर राजवंश द्वारा पूजा की जाती थी। गत कई वर्षों से यहां नियमित पूजा के लिए कोई पुजारी नियुक्त नहीं है। मंदिर के प्रति आस्था रखने वाले जरूर कभी-कभी यहां पूजा कर जाते हैं। दो मंजिलों में बनी यह बावड़ी केवल जलस्रोत नहीं रही बल्कि विश्राम स्थल भी रही। इस बावड़ी के जल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता था। मंदिर का शिखर नागर शैली में बना है तो अन्य भाग राजपूत व मराठा शैली में बने हैं।

राजा के साथ सरदार भी होते थे पूजा में शामिल

इतिहासकार स्व. गणेश मतकर के संग्रह से उनके बेटे सुनील मतकर ने बताया कि होलकर शासकों द्वारा भव्य पैमाने पर चंपा षष्ठी पर्व मनाया जाता था। राजोपाध्याय द्वारा राजा-रानी की अनुस्थिति या रस्म विशेष पर पंचभैया होलकर (होलकर परिवार के पांच पुरुषों) के साथ यह पूजा कराई जाती थी। पूजन का आरंभ राजवाड़े से होता था। प्रतिपदा से षष्ठी तक खंडोबा की पूजा व आरती की जाती थी। अंतिम दिन हरी लहसुन, हरा प्याज, मटर मिला हुआ बैंगन का भर्ता, रोड़गा (बाजरे की छोटी रोटी), दाल-चावल, पापड़, कुर्ळई बनाकर उसका भगवान को भोग लगता था। मंदिर की चौखट पर ध्वज पूजन होता था और तली भंडार होता था।

इसमें हल्दी में नारियल के टुकड़े मिलाकर उछाला जाता था। पूजन में शामिल होने के लिए राजा-रानी लवाजमे के साथ आते थे और पहले मंदिर की प्रदक्षिणा करते थे। उनके साथ पंचभैया होलकर और सरदार भी पूजा करते थे। राजा और पंचभैया होलकरों द्वारा पांच बार आरती की जाती थी। इसमें एक क्रम यह भी आता था जिसमें राजा अपनी पगड़ी पर चांदी की थाली में रखे मल्हारी मार्तंड के छापे को रखकर उससे आरती करता था।

कोई नहीं सुध लेने वाला

गौरवशाली इतिहास की साक्षी रही यह बावड़ी और मंदिर आज वीरान पड़े हैं। कुछ माह पहले नईदुनिया की पहल से जरूर बावड़ी की सफाई की गई थी, लेकिन दुबारा वहां गंदगी फैल चुकी है। पैलेस देखने आने वालों को तो यह जानकारी भी नहीं होती कि यहां बावड़ी और मंदिर भी है। इसकी जानकारी या दिशानिर्देशन देता न तो बोर्ड है और ना ही रास्ता ऐसा है कि यहां बिना जानकारी के जाया जा सके। बावड़ी का एक हिस्सा सड़क की तरफ भी है जिस वजह से कई लोग यहां पूजन सामग्री विसर्जित तो कर देते हैं जो अब यहां गाद के रूप में जमा होती जा रही है।

Posted By: Sameer Deshpande

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