Indore News: इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। इंदौर...एक ऐसा शहर जिसकी रगों में राग लहू बनकर बहते हैं, संगीत जिसकी सांसों में बसता है और परंपरा जिसकी पहचान है। अपने आप में घराने के रूप में स्थापित यहां का संगीत यूं ही समृद्ध नहीं हुआ। यह धरती उस्ताद अमीर खां, मामा मजूमदार, उस्ताद जहांगीर खां, बंडू भैया चोघुले, मुनीर खां, बाबू खां सहित कई सिद्धहस्तों के ज्ञान की धारा से सिंचित है। जहां आज भी है संगीत की रवायत, रागदारी की रुहानियत। राजाश्रय से लोकाश्रय तक के युग का साक्षी रहा यहां का संगीत केवल शास्त्रीय परंपरा का ही प्रतिमान स्थापित करने वाला नहीं रहा बल्कि सुगम संगीत की दुनिया में स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से लेकर पलक मुछाल तक के अनेक नामों से भी सजा हुआ है।

यही वह शहर है जहां वर्षों तक संगीत की शिक्षा देने के एवज में गुरु ने शिष्य से दक्षिणा लेने के बजाए उनके घर जाकर भी सिखाने से गुरेज नहीं किया। मकसद यही था कि संगीत की परंपरा इस शहर से अनवरत बहती रहे, जिसे आज भी आगे बढ़ाने का प्रयास शहर का शासकीय संगीत महाविद्यालय कर रहा है।

चिमनबाग क्षेत्र केवल खेल के लिए ही नहीं बल्कि संगीत के लिए भी जाना जाता है। 1965 में यहां बने शासकीय संगीत महाविद्यालय का इतिहास तो और भी पुराना है। महात्मा गांधी मार्ग पर जहां वर्तनाम में कला संकुल आकार ले रहा है, किसी वक्त वहां मराठी स्कूल हुआ करता था और उसी विद्यालय में संगीत की शिक्षा भी दी जाती थी। शहर में इसी स्थान से 1935 में संगीत महाविद्यालय की शुरुआत हुई जहां शाम के वक्त संगीत की शिक्षा दी जाती थी। इस संस्थान ने देश को कई नामी कलाकार दिए।

शिक्षा देने के एवज में जीवनभर नहीं ली राशि

वरिष्ठ तबला वादक दिनकर मजूमदार बताते हैं कि शहर में संगीत की शिक्षा देने का इतिहास होलकर शासनकाल के वक्त से है। तुकोजीराव होलकर (तृतीय) ने 1911 में होली पर आयोजित समारोह में बनारस से जहांगीर खां को तबला वादन के लिए आमंत्रित किया था। उनके वादन से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जहांगीर खां को दरबारी तबला वादक के रूप में नियुक्त किया और यहां संगीत की शिक्षा देने की बात कही। जहांगीर खां ने जीवनभर शिक्षा दी पर कभी उसके एवज में राशि नहीं मांगी। एक बार जब मैंने उनसे शिक्षा लेना अर्थिक परेशानी के चलते बंद किया तो वे खुद मेरे घर आए और कहा कि दक्षिणा की चिंता में शिक्षा मत छोड़ो।

गायन-वादन ही नहीं नृत्य का भी समावेश

संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य अरुण मोरोणे बताते हैं कि होलकर शासन काल में शुरू हुआ महाविद्यालय 1985 तक उच्च शिक्षा विभाग के अधीन था। 1986 में संस्कृति संचालनालय में यह शामिल हुआ। शुरुआती दौर में यहां केवल गायन और वादन (तबला, वायलिन और सितार) की ही शिक्षा दी जाती थी लेकिन 2010 में जनभागीदारी से यहां नृत्य (कथक) का प्रशिक्षण देना भी शुरू हुआ। संस्थान के मंच पर अमीर खां, कुमार गंधर्व, पं. भीमसेन जोशी, पं. जितेंद्र अभिषेकी, मालिनी राजपुरकर, बसवराज राजगुरु, रूपक कुलकर्णी आदि प्रस्तुति दे चुके हैं। डिप्लोमा से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा देने वाले इस संस्थान में 10 वर्षीय विद्यार्थी से लेकर उम्रदराज तक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।

Posted By: Sameer Deshpande

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