Khel Khel Mein Indore: खेल-खेल में, कपीश दुबे

राहुल गांधी भारत जोड़ने के नारे के साथ कदमों से देश नाप रहे हैं। मगर कवायद का उनकी ही पार्टी पर असर होता नजर नहीं आ रहा। जब इंदौर से यात्रा गुजरी थी तो सब हमकदम थे, लेकिन अब लगता है दूर के ढोल सुहावने थे। यात्रा कश्मीर तक पहुंच चुकी है और पीछे-पीछे पार्टी की दरारें उभर रही हैं। राजस्थान में दो दिग्गजों के जुबानी तीर राष्ट्रीय सुर्खियां बन रहे थे कि इंदौर में भी पार्टी मुख्यालय पर नेताओं ने अपने ही अध्यक्ष का पुतला जला दिया। एक दिन के भीतर संगठन को अपना ही फैसला रोकना पड़ा। ऐसा लग रहा है मानो यह गुड्डे-गुड़ियों का खेल हो। कांग्रेस को कांग्रेस हराती है, यह कहावत सबने सुनी थी, मगर ऐसा क्यों कहा जाता है अब पूरा शहर देख भी रहा है। पुरानी इमारत की दरारें खुलकर सामने आ गई हैं। समय रहते संगठन ने सुधार नहीं किया, तो दरकना तय है।

खेलो इंडिया से पहले खेल स्पर्धा की चिंता

शहर में इन दिनों खेलो इंडिया की चर्चा है। मेजबान सरकार खुद है, इसलिए हर वह तरीका आजमाया जा रहा है जिससे लगे कि शहर में कुछ होने वाला है। अब तक बड़े-बड़े टूर्नामेंट कराने के लिए खेल संगठनों को सरकारी मदद के लिए चक्कर काटना पड़ते थे, लेकिन अब आठ टीमों के टूर्नामेंट के लिए ऐसी तैयारी हो रही है मानो विश्व कप शहर में हो। बैठकों में उन खेल संघों को भी बुलाया जा रहा है, जिनके खेल शहर में होना ही नहीं हैं। मगर साहब का आदेश है तो हाजिरी सब भरते हैं। एक बैठक में सुझावात्मक लहजे में फरनाम सुना दिया गया कि सबको अलग से खेल स्पर्धा कराना चाहिए। अब स्पर्धा कराना आसान काम तो है नहीं। खेलो इंडिया के लिए भरपूर बजट है, लेकिन स्थानीय स्पर्धा कैसे होगी यह चिंता खेल संघों को सता रही है। जो साधन संपन्न हैं, उन्होंने कमर कस ली है, मगर जिनकी जुगाड़ नहीं बैठी वे बचने के रास्ते तलाश रहे हैं।

मैच में पुलिस की मुस्तैदी

शहर में जब भी अंतरराष्ट्रीय मैच होता है, पुलिस सबसे ज्यादा मुस्तैद होती है। अधिकारियों से ज्यादा निर्देशों के प्रति सजगता निचले स्तर पर होती है। इस बार भी मैच के लिए सभी पहले से सावधान की मुद्रा में थे। साहब का आदेश सिपाहियों के लिए सिर आंखों पर होता है। दोनों टीमें जब इंदौर पहुंची तो होटल के बाहर रास्ते रोक दिए गए। कुछ महिलाएं इसी होटल में ठहरी थीं और वापस लौटीं तो रोक दिया गया। वे गिड़गिड़ाती रहीं कि टीम दूसरे गेट से प्रवेश करेगी, हमें पहले गेट से जाने दें, लेकिन सिपाहियों के लिए साहब का आदेश सिर आंखों पर था। हैरानी तब हुई जब भारतीय टीम के लोकल मैनेजर अनिल जोशी को भी रोक दिया गया। जोशी टीम के पीछे दूसरे वाहन से आए थे। काफी समझाने के बाद एक टीआइ के हस्तक्षेप से उनके लिए राह खुली। खैर, शहर में भी पुलिस की ऐसी ही मुस्तैदी रहे तो और भी बेहतर होगा।

मैच में इंदौरी दर्शक भी बने चैंपियन

इंदौर की ख्याति कई वजहों से दुनिया में है, जिसमें बीते कुछ सालों से सफाई का नंबर सबसे पहले आता है। मगर इंदौर की पहचान आजादी के पहले से क्रिकेट हुआ करता था। होलकर रियासत की टीम विदेश में भारत का प्रतिनिधित्व करती थीं। शहर की रगों में क्रिकेट रचा-बसा है। क्रिकेट के यह संस्कार मैदान में भी नजर आते हैं। शहर में कोई भी मैच हो, इंदौरियों की दीवानगी एक सी रहती है। यहां टेनिस गेंद क्रिकेट के मुकाबले देखने भी हजारों की भीड़ जुटती है। मंगलवार को भी न्यूजीलैंड से टक्कर में भारत की हौसला अफजाई में कसर नहीं रखी। जोश सिर्फ युवाओं में ही नहीं था, हर उम्र के लोग इसमें शामिल थे। मैदान के अंदर और बाहर कहीं कोई अप्रिय घटना सुनने-देखने को नहीं मिली। मैच में न गंदगी फैलाई, न अनुशासनहीनता दिखी। मैदान में हर कोई सिर्फ प्रशंसक था। क्रिकेट का यही जुनून इंदौर की खेल जगत में अलग पहचान है।

Posted By: Sameer Deshpande

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