इंदौर, नईदुनिया रिपोर्टर। मन में कोई डर नहीं, चेहरे पर कोई शिकन नहीं। सामने कोई भी हो लेकिन हमें अपना 100 फीसदी परफॉर्मेंस देना है। यहां बात खेल के मैदान में जीतकर आने वाले खिलाड़ियों की नहीं, बल्कि जिंदगी के मैदान में जीतकर आने वाली महिलाओं की हो रही है, जिन्होंने कैंसर को अपने हौसले और जज्बे से मात दी है। संगिनी कैंसर केयर सोसायटी द्वारा रविवार को प्रीतमलाल दुआ सभागृह में संगिनी की फाउंडर डॉ. अनुपमा नेगी की याद में आयोजित उमंग कार्यक्रम में कैंसर विजेता और सरवाइवर महिलाओं ने अपनी जिंदगी के अनुभव साझा कर न सिर्फ दूसरे मरीज, बल्कि आम आदमी को भी जिंदगी जीने का अंदाज सिखा दिया।

विजेता महिलाओं ने खूबसूरत नृत्य और संगीत की प्रस्तुति भी दी। कुछ प्रतिभागी ऐसी भी थीं, जिनकी कुछ ही दिन पहले कीमोथैरेपी हुई थी और कुछ की एक-दो दिन में ही होना है लेकिन उनके अंदर की ऊर्जा और आत्मविश्वास से यह अंदाज लगाना मुश्किल था कि वे किस दौर से गुजर रही हैं। कुछ की 25 से अधिक बार कीमो हो चुकी है लेकिन ये सभी अपनी जिंदगी की दूसरी पारी को पहली से भी ज्यादा एंजाय कर रही हैं। संगिनी की सचिव पद्मश्री जनक पलटा मिगलिगन ने कहा कि मैं खुशनसीब हूं कि मुझे कैंसर हुआ, क्योंकि उसके बाद मेरी जिंदगी जीने का तरीका ही बदल गया। मैंने पूरी जिंदगी में इतना काम नहीं किया, जितना 11 साल में किया। डॉ. अनुपमा नेगी के शब्द आज भी याद हैं कि कैंसर का इलाज अंत नहीं है। जिंदगी तो उसके बाद शुरू होती है।

तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं...

कैंसर सरवाइवर सरिता जैन ने 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं' और अनीता हेमनानी ने 'छूकर मेरे दिल को किया तूने क्या इशारा" गीत की प्रस्तुति दी। कोमल रामचंदानी ने बताया कि 2002 में उनकी शादी हुई। 2012 में उनकी बेटी हुई। 2016 में पता चला कि स्तन कैंसर है। ऑपरेशन हुआ, कीमो हुई। बाल चले गए। बेटी के सामने आते ही हिम्मत हार जाती थी। लेकिन बेटी ही हिम्मत बनकर खड़ी हुई। बड़ी मासूमियत के साथ बोली मम्मा मुंडन के बाद मेरे बाल आ गए आपके भी आ जाएंगे। उन्होंने अपने दिल का दर्द बयां करते हुए बेटी को समर्पित कविता सुनाई 'सच कहते हैं लोग बेटियां तारणहार होती हैं।'

खुद के लिए जीना भी सीखना चाहिए

डीएवीवी के मानव संसाधन विकास केंद्र की डायरेक्टर डॉ. नम्रता शर्मा ने कहा कि हम छोटे से दर्द से परेशान हो जाते हैं लेकिन आज इन्हें देखकर अहसास होता है, ये ही सही मायनों में प्रेरणा देने वाले लोग हैं। आज पहली बार अहसास हुआ कि एक महिला होने के नाते हम हमेशा त्याग करते रहते हैं लेकिन हमें खुद की देखरेख करना और खुद के लिए भी जीना सीखना चाहिए। संगिनी की को-ऑर्डिनेटर अनुराधा सक्सेना ने संगिनी की सालभर की गतिविधियों का ब्योरा दिया।

हराने की हिम्मत रखती हूं

मुंबई से आईं डॉ. ममता गोयनका, जिन्हें तीन बार कैंसर हो चुका है कहती हैं मै कैंसर को हर बार हराने कि हिम्मत रखती हूं। कैंसर का पता चले तो डरने की जगह उससे लड़ने के लिए बॉक्सिंग ग्लब्ज पहन लें। अपने अंदर विश्वास रखिए कि कुछ नहीं होगा। इधर-उधर भटकने की जगह मेडिकल टीम पर विश्वास रखें। तीसरा विश्वास सुपरपावर या भगवान में रखें। डॉ. गोयनका 20 साल से टाटा मेमोरियल में सेवाएं दे रही हैं। अमेरिका की पर्यावरणप्रेमी, बांसुरी वादक व सेल्फ हीलिंग कोच जेना हेस्सो ने सेल्फ हीलिंग का तरीका बताया।

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