इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। मालवी-निमाड़ी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) में शोधपीठ को मंजूरी मिल गई है। अगले महीने तक विश्वविद्यालय प्रशासन को शोधपीठ के संचालन के लिए समिति बनाना है। खास बात यह है कि ये डीएवीवी की चौथी शोधपीठ है। इससे पहले भी तीन शोधपीठ गठित हो चुकी है, लेकिन सालभर से वहां कोई गतिविधि नहीं हुई है। जिम्मेदार कोरोना की आड़ लेकर आठ महीने का हिसाब जरूर बता रहे हैं। उधर कार्यपरिषद सदस्यों ने बाकी तीनों शोधपीठ की अब तक सारी गतिविधियों के बारे में पूछा है।

डीएवीवी में डेढ़ साल बाद कार्यपरिषद हुई है। जहां सदस्य डॉ.विश्वास व्यास के मालवी-निमाड़ी शोधपीठ के प्रस्ताव पर बाकी ईसी सदस्य भी सहमत हो गए। डॉ.अनंत पंवार ने संत सिंगाजी के नाम पर शोधपीठ रखने का सुझाव दिया। शोधपीठ के जरिए मालवी-निमाड़ी भाषा का प्रचार व्यापक स्तर तक करना है। शोधपीठ के लिए दो

हजार किताबें भी कई लेखकों ने दान करने का फैसला किया है। गुरुवार को बैठक के दौरान अधिकारियों ने बताया कि सिंधु शोधपीठ, गांधी शोधपीठ और देवी अहिल्या शोधपीठ है। इन्हें गठित हुए लगभग 15 से 36 महीने हो चुके हैं।

लगभग सालभर से एक भी शोधपीठ में न तो विषय विशेषज्ञों के व्याख्यान करवाए हैं न कोई कार्यक्रम रखे हैं। यहां तक बजट भी मांगा जा रहा है। बताया जाता है कि महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर गांधी शोधपीठ बनाई थी। जहां एक भी कार्यक्रम अभी तक हुआ है। जबकि देवी अहिल्या शोधपीठ सिर्फ नाम की बनी है। सिंधु शोधपीठ में तीन से चार व्याख्यान हुए हैं। सदस्यों ने तीनों शोधपीठ की जानकारी मांगी है, जिसे अगली बैठक में अधिकारियों को प्रस्तुत करना है। प्रभारी रजिस्ट्रार अनिल शर्मा का कहना है कि मालवी-निमाड़ी भाषा में शोधपीठ के लिए अनुदान की व्यवस्था की जाएगी।

Posted By: gajendra.nagar

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