World Organ Donation Day : इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जीवित रहते हुए तो हर कोई अच्छे काम करता है, लेकिन कुछ लोग मृत्यु के बाद भी ऐसे काम कर जाते हैं, जिनसे वे अमर हो जाते हैं। ऐसा ही काम इंदौरी भी कर रहे हैं। शहर में अंगदान की शुरुआत 22 वर्ष पहले हुई थी। 24 अप्रैल 2000 को विजय नगर क्षेत्र निवासी बैंक अधिकारी पिता ने 14 वर्षीय बेटे की आकस्मिक मृत्यु के बाद अंगदान का निर्णय लिया था। पिछले सात साल में 44 ग्रीन कारिडोर बन चुके हैं यानी 44 ब्रेनडेड लोग कई को नया जीवन दे गए। कोरोना काल को छोड़कर लगभग हर साल अंगदान हुआ। पिछले पांच साल में यह आंकड़ा 800 के पार पहुंच चुका है।

22 अप्रैल 2000 को विजय नगर क्षेत्र निवासी दिलीप मेहता का परिवार चार पहिया वाहन से इंदौर से नागदा जा रहा था। नागदा के कुछ पहले दुर्घटना हुई और 14 वर्षीय इकलौता बेटा मयंक गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके सिर पर गंभीर चोट आई थी। इलाज के दौरान डाक्टरों ने उसे ब्रेनडेड घोषित कर दिया। परिवार के लिए इस वज्रघात को सहन कर पाना बहुत मुश्किल था। फिर भी दिलीप और उनकी पत्नी संगीता ने साहस का परिचय दिया और बेटे के अंगों को दान करने का निर्णय लिया। मयंक की दोनों किडनियां, त्वचा और आंखें दान की गईं। संभवत: यह शहर का पहला अंगदान था। मेहता दंपती ने इसके बाद ब्रेनडेड घोषित हो चुके मरीजों के स्वजन की काउंसलिंग भी शुरू की। उन्होंने कई लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित किया। वर्षों तक इक्का-दुक्का अंगदान होता रहा।

संभागायुक्त ने फैलाई थी जागरूकता - 2015 में सिलसिला फिर शुरू हुआ। 7 अक्टूबर 2015 को खरगोन जिले के ग्राम बलवाड़ी निवासी रामेश्वर खेड़े को इंदौर में इलाज के दौरान ब्रेनडेड घोषित किया गया। स्वजन ने रामेश्वर के अंग दान करने का निर्णय लिया। वर्षों बाद शहर में ग्रीन कारिडोर बनाकर अंग दूसरे शहर भेजे गए थे। 2016 में ग्रीन कारिडोर के माध्यम से 12 और लोगों के अंग दान किए गए। 2017 में संख्या बढ़कर 16 हो गई। तत्कालीन संभागायुक्त संजय दुबे और एमजीएम मेडिकल कालेज के डीन डा. संजय दीक्षित ने अंगदान को लेकर जागरूकता फैलाने में खासी रुचि ली, लेकिन बाद में यह मुहिम सुस्त पड़ गई। 2018 में सिर्फ छह ग्रीन कारिडोर बने और 2019 में सिर्फ तीन। 2020 में तो एक भी ग्रीन कारिडोर नहीं बन सका था। 2021 में तीन और 2022 में दो ग्रीन कारिडोर बनाए गए।

पुलिस ने नहीं किया था सहयोग - 22 वर्ष पहले अंगदान को लेकर जागरूकता का बहुत अभाव था। नईदुनिया से अंगदान के अनुभव साझा करते हुए दिलीप मेहता ने बताया कि मयंक का इलाज नोबल अस्पताल में चल रहा था। अंगदान के लिए उसे चोइथराम अस्पताल शिफ्ट करना था। वहां ले जाने के लिए ग्रीन कारिडोर बनाया जाना था, लेकिन पुलिस ने कोई सहयोग नहीं किया। पुलिस थाने से कहा गया कि आप अपने जोखिम पर ले जाएं। हम कुछ नहीं कर सकते। बाद में अंगदान की खबर अखबार में प्रकाशित हुई तो लोगों को इसकी जानकारी लगी।

सात साल में 44 ग्रीन कारिडोर - इंदौर के एमजीएम मेडिकल कालेज के डीन डा. संजय दीक्षित का कहना है कि सात साल में अब तक शहर 44 ग्रीन कारिडोर के माध्यम से अब तक 16 हृदय, दो फेफड़े, 250 किडनी, 19 लिवर, 1900 के लगभग कार्निया और 62 त्वचा ट्रांसप्लांट करवाकर अपनी पहचान बना चुका है। पर्याप्त जागरूकता अभियान चलाया जाए तो अंगदान के आंकड़े बढ़ेंगे।

जागरूकता के लगातार प्रयास - मुस्कान ग्रुप इंदौर के सेवादार जीतू बागानी का कहना है कि शुरुआत में ब्रेनडेड व्यक्ति के स्वजन को अंगदान के लिए तैयार करना बहुत मुश्किल था। धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ने लगी है। अब लोग स्वत: प्रेरणा से अंगदान के बारे में सोचने लगे हैं। हम जागरूकता को लेकर लगातार प्रयास कर रहे हैं।

Posted By: Hemraj Yadav

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close