कॉलम : योगाचार्य की सलाह

स्वस्थ रहने के लिए लंबा गहरा श्वास-प्रश्वास बहुत जरूरी है। जब हम अपने श्वास-प्रश्वास पर ध्यान लगा लेते हैं और उसे एक नियमित गति में ले आते हैं तो हमारे शरीर में मौजूद रसायन डोपामाइन, सिटोनीम, ऑक्सीमोटोसीन और इंडोसीन संतुलित हो जाते हैं। यदि इनमें से एक भी रसायन असंतुलित होता है तो हमारी प्राणवायु असंतुलित हो जाती है जिससे शरीर अस्वस्थ हो जाता है। नियमित रूप से प्राणिक क्रिया करके प्राणवायु को संतुलित किया जा सकता है। प्राणिक क्रिया का संबंध संतुलित श्वास से है। प्राणिक क्रिया पांच प्रकार से की जाती है और इसमें श्वास लेने में पांच तथा श्वास छोड़ने में 10 सेकंड का समय लगता है। प्रत्येक क्रिया की तीन से पांच आवृत्ति दिन में एक या दो बार करनी चाहिए। सभी क्रियाएं खड़े होकर की जाती हैं। पहली क्रिया में प्रणाम मुद्रा में खड़े हो जाएं। श्वास भरते हुए प्रणाम मुद्रा में ही हाथ को ऊपर उठाएं और श्वास छोड़ते हुए हाथ नीचे लाएं। दूसरी क्रिया में हाथ सामने की ओर रखें तथा श्वास भरते हुए हाथ कंधे की सीध में फैलाएं और थोड़ा पीछे की ओर झुक जाएं। श्वास छोड़ते हुए हाथ दोबारा आगे लाएं। तीसरी क्रिया के लिए प्रणाम मुद्रा में खड़े हो जाएं और श्वास भरते हुए हाथ सीधे किए बिना दोनों हाथों, कंधों को पीछे ले जाएं। श्वास छोड़ते हुए फिर प्रणाम मुद्रा में आ जाएं। चौथी क्रिया में दोनों कंधों को हथेलियों से पकड़कर श्वास भरते हुए कोहनी सामने करते हुए मिलाएं और सांस छोड़ते हुए फिर कोहनी कंधे की सीध में ले आएं। पांचवी मुद्रा में कंधों को हथेलियों से पकड़ें और श्वास भरते हुए कोहनियों को ऊपर करते हुए सिर से हाथ लगा लें। प्रश्वास में हाथ नीचे ले आएं।

- राजकुमार जैन, योग विशेषज्ञ

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