Tokyo Olympics: अरविंद शर्मा, इटारसी। देश और प्रदेश में खेलों को लेकर बड़े स्तर पर सकारात्मक माहौल तैयार हुआ है। प्रतिभाओं को पहचान कर न सिर्फ तराशा जा रहा है बल्कि प्रदर्शन के अवसर भी मिल रहे हैं। इससे खिलाड़ियों में जागे आत्मबल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपब्धियों का रास्ता खोला है। भारतीय हाकी टीम के खाते में 41 साल बाद यदि कोई पदक आया है तो यह इसी सकारात्मक माहौल की ही देन है। यह कहना ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता भारतीय हाकी टीम के सदस्य विवेक सागर का है।

टोक्यो से नईदुनिया से इंटरनेट कॉल पर विशेष चर्चा करते हुए विवेक ने कहा कि भारतीय टीम का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है। जर्मनी को पराजित कर भारत ने कांस्य पदक अपने नाम तो कर लिया है लेकिन लक्ष्य देश के लिए स्वर्ण पदक लाना है। हमें पूरा विश्वास है कि हमारी टीम अभी और बेहतर कर साबित करेगी। मौजूदा दौर में केन्द्र और राज्य सरकारें खिलाड़ियों के लिए जितना प्रयास कर रही हैं, बेहतर सुविधाएं और दमदार कोच दिए जा रहे हैं, इससे खिलाड़ियों का जोश बढ़ा है, यही वजह रही कि इस ओलिंपिक में कई खिलाड़ियों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। हमें इतने अच्छे कोच, अच्छे संस्थानों में अभ्यास का अवसर और सुविधाएं मिली हैं जिसे बताना मुश्किल है। हमारी टीम लगातार सुधार की दिशा में अपना अभ्यास जारी रखेगी, अब अगले लक्ष्य की ओर बढ़ना है। विवेक जल्द ही टोक्यो से भारतीय टीम के साथ स्वदेश लौटेंगे। इन दिनों वे टोक्यो में हैं।

ओलिंपिक के अपने अनुभव को लेकर उन्होंने कहा विश्व के कई देशों से अलग-अलग खेलों के नामी खिलाड़ी हमारे आसपास रहते हैं, हमारे साथ पदक वितरण समारोह में शरीक हुए, हमारे साथ खाना खाया, यह एक अनूठा ही अनुभव लगता है, ऐसे खिलाड़ी जिन्हें हम टीवी या इंटरनेट मीडिया पर देखते हैं उनका साथ रोमांच पैदा करता है।

विवेक के संघर्ष ने दूर कर दी परिवार की मुफलिसी, कभी किराए की झोपड़ी में गुजारे थे दिन

टोक्यो ओलिंपिक में भारतीय हॉकी टीम के शानदार प्रदर्शन के बाद सुर्खियों में आए ग्राम चांदौन निवासी विवेक सागर का बचपन मुफलिसी और संघर्ष में बीता है। विवेक का परिवार कभी किराए की झोपड़ी में रहता था। साल 1980 में पिता रोहित प्रसाद ने झिरमऊ के निजी स्कूल में शिक्षक की नौकरी की, तो मां कमला महिलाओं के कपड़े सिल कर घर का खर्च चलाने में सहयोग करती थीं। कई सालों बाद पिता की प्राथमिक स्कूल में सरकारी नौकरी लगी तो वेतन भी सात हजार हो गया था। आज भी विवेक का परिवार टिनशेड के मकान में रहता है। उसके बड़े भाई विद्यासागर प्रसाद बताते हैं कि जब विवेक हाकी खेलने जाता था, तब पिता डांटते थे, मैंने कहा कि पिताजी यदि विवेक कुछ नहीं कर सका तो मैं नौकरी करके आपको सहारा दूंगा, लेकिन आप विवेक को खेलने जाने दो, जो उसे अच्छा लगता है करने दो। उस दिन यदि पिता विवेक का रास्ता रोक लेते तो आज विवेक वह मंजिल हासिल नहीं कर पाता, जिसकी उसे तमन्ना थी।

मां कमला देवी ने बताया कि हम किराए के कच्चे मकान में रहते थे। बारिश में छत टपकती थी। किसी तरह बच्चों का लालन-पालन किया, विवेक की बड़ी बहन का विवाह जम्मू में हुआ है, जबकि छोटी बहन पढ़ाई कर रही है। मां ने कहा हमने कभी सोचा नहीं था कि विवेक एक दिन इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचेगा।

Posted By: Ravindra Soni

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