सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन में कूदे जबलपुर के 16 वर्षीय गुलाब सिंह पटेल मध्य प्रदेश के पहले बलिदानी बने थे। उन्होंने हाथों में तिरंगा लेकर अगस्त क्रांति के करो या मरो के संदेश को साकार कर दिया था।

जबलपुर के इतिहासविद डा.आनंद सिंह राणा बताते हैं कि आठ अगस्त, 1942 की शाम अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। इसकी जानकारी लगते ही जबलपुर के स्वतंत्रता सेनानियों में नये जोश का संचार हो गया। इसीलिए नौ अगस्त को जबलपुर के लगभग सभी वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अंग्रेजों की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अब अगस्त क्रांति को गति देने की समूची जिम्मेदारी किशोरों व नवयुवकों के कांधों पर आ गई थी। 10 अगस्त, 1942 को जबलपुर के व्यस्ततम व्यापारिक क्षेत्र फुहरा में अपार जनमेदिनी उमड़ी थी। कमानिया गेट के चारों तरफ सारे रास्ते स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से भरे हुए थ। इसी दौरान घमंडी चौक से गुलाब सिंह पटेल के नेतृत्व में विद्यार्थियों का जुलूस पुलिस की घेराबंदी तोड़कर आगे बढ़ा। इससे पहले कि जुलूस अपने गंतव्य स्थल फुहरा-कमानिया गेट तक पहुंचता रास्ते में तिरंगा हाथों में लिए गुलाब सिंह की एक आवाज पर सभी के दम थम गए। गुलाब सिंह ने पूरा जोर लगाकर वंदे मातरम का उद्घोष किया। सबने स्वर मिलाया। यह देख तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट देवबक्श सिंह ने कार्रवाई का निर्देश जारी कर दिया। एक पुलिस कर्मी ने गुलाब सिंह पर निशाना साधकर गोली चला दी। गोली सीधे गुलाब सिंह के सिर पर लगी। लहुलुहान गुलाब को विक्टोरिया अस्पताल ले लाया गया।

कमानिया में तिरंगा फहराकर मुझे सूचित करना :

रक्तरंजित अवस्था में भी गुलाब सिंह दूसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से यह कहते नजर आए कि साथियो कमानिया गेट पर तिरंगा फहराकर मुझे सूचित करना। उनकी इस इच्छा को अंगीकार कर जैन बायज स्काउट्स एसोसिएशन के विद्यार्थियों ने पुलिस के पहले को तोड़कर अंतत: कमानिया गेट पर तिरंगा फहराकर ही दम लिया। इसकी जानकारी लगने पर गुलाब सिंह के चेहरे पर जो प्रसन्नता खिली थी, वह राष्ट्रीय गौरव से आेतप्रोत थी।

14 अगस्त को जन्म और 14 अगस्त को ही आंख मूंदी :

यह संयोग भी उल्लेखनीय रहा कि जबलपुर में 14 अगस्त को जन्मे गुलाब सिंह ने 10 अगस्त को गोली लगने के बाद चार दिन तक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष के उपरांत 14 अगस्त, 1942 को अंतिम सांस ली। इस तरह उनका नाम भारत छोड़ो आंदोलन के मध्य प्रदेश में सर्वप्रथम बलिदानी के रूप में चिरकाल के लिए अमर हो गया।

Posted By: Jitendra Richhariya

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