अनुकृति श्रीवास्तव, जबलपुर, नईदुनिया Nano Yagya Kund । गायत्री परिवार द्वारा नैनो यज्ञ कुंड के माध्यम से घर-घर में यज्ञ थैरेपी की शुरुआत की गई है। इस नैनो यज्ञ कुंड का निर्माण शहर से लगभग 22 किलोमीटर दूर सुंदरपुर गांव की महिलाएं अपने हाथों से कर रही हैं। एक ओर नैनो यज्ञ थैरेपी कोरोना के समय में संक्रमण से बचाव में तो सहायक है ही साथ ही सुंदरपुर के लगभग 200 परिवारों को रोजगार भी मिल गया है। पहले यहां पर एक परिवार की आय एक हजार रुपए थी जो अब बढ़कर लगभग चार हजार रुपए हो चुकी है। गायत्री परिवार के सदस्य प्रकाश मूरजानी ने बताया कि सुंदरपुर गांव को गायत्री परिवार द्वारा गोद लिया गया है। यहां पर पिछले दो सालों से लगातार नैनो यज्ञ कुंड का निर्माण हो रहा है। जिससे गांव के लोगों को रोजगार मिल रहा है।

नैनो यज्ञ कुंड गायत्री परिवार की पिछले पांच सालों की रिसर्च की परिणाम है। रिसर्च में यह प्रमाणित हुआ है कि यदि लगातार एक माह तक इस नैनो यज्ञ कुंड में नियमित यज्ञ किया जाए तो कई संक्रामक बीमारियों से बचा जा सकता है। प्रयोग के दौरान नैनो यज्ञ के दौरान वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने व कार्बनडायऑक्साइड की मात्रा कम होने के परिणाम मिले हैं। कोरोना काल में संक्रमण से बचने के लिए नैनो यज्ञ कुंड की डिमांड और अधिक बढ़ गई है। वर्तमान में देश के लगभग हर राज्य में नैनो यज्ञ कुंड शहर से भेजा जा रहा है। देश ही नहीं विदेशों में यूएस, मलेशिया,सिंगापुर, साउथ अफ्रीका तक में नैनो यज्ञ कुंड सुंदरपुर से बनाकर ही भेजा जा रहा है।

वेस्ट से बन रहा है नैनो यज्ञ कुंड

नैनो यज्ञ कुंड के निर्माण में गाय का गोबर प्रमुख पदार्थ है। इसमें पीपल, बेल, तुलसी, अकौआ, गेंदे का फूल, देशी कपूर मिलाकर गोबर को आटे की तरह माड़ा जाता है फिर दीए के आकार के(लगभग 1 से 2 इंच) यज्ञ कुंड बनाए जा रहे हैं। यह कुंड बनाने के लिए पुरानी टेनिस बॉल को बीच से आधा काटक्र दो सांचे तैयार किए जाते हैं। महिलाएं इन सांचों में गोबर का मिक्चर डालकर उसे दिए के शेप में तैयार कर सुखाती हैं। फिर करीब दो इंच की ही मिट्टी की बनी बेटी पर यज्ञ कुंड रखकर उसमें हवन किया जा रहा है।

जड़ी-बूटियों से बनी यज्ञ सामग्री

हवन के लिए जो सामग्री बनाई जाती है उसमें ऐसी जड़ी बूटियों को शामिल किया गया है जो संक्रमण को दूर करती हैं। जड़ी बूटियों में अर्जुनछाल, गिलोय, अश्वगंधा, मुलैठी, वासा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सरस्वती पंचक, वन तुलसी, सतावर जैसी बड़ी बूटियों को मिलाकर बनाया गया है। गायत्री परिवार द्वारा की गई रिसर्च बताती है कि गाय का गोबर जब गीला होता है तो उसमें 21 से 22 प्रतिशत ऑक्सीजन होती है। जब गोबर सूच जाता है तो उसमें आक्सीजन का प्रतिशत 28 प्रतिशत हो जाता है। जब कंडे के रूप में गोबर जलया जाता है तो ऑक्सीजन का स्तर 48 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। यदि गाय के गोबर के कंडे में गाय का शुद्ध घी मिलाकर जलाते हैं तो आक्सीजन का स्तर 61 प्रतिशत तक हो जाता है। गायत्री परिवार द्वारा यज्ञ करने से पहले और बाद के तनाव के स्तर को जांचने का भी प्रयोग चल रहा है।

प्रकाश मूरजानी बताते हैं कि बारिश के दौरान गोबर संक्रमित होता है और यज्ञ कुंड सूखने में भी परेशानी होती है। इसलिए जून तक यज्ञ कुंड बना लिए जाते हैं। फिर दशहर के बाद पुन: यज्ञ कुंड बनाने का कार्य शुरू किया जाता है।

Posted By: Ravindra Suhane

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