Ayodhya Ram Mandir : सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। अयोध्या में पांच अगस्त को जिन रामलला की जन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण का श्रीगणेश होने जा रहा है, उन्होंने ही नर्मदा परिक्रमा की समृद्ध परम्परा शुरू की थी। त्रेतायुग से कलयुग तक राम के दर्शाये आदर्श-पथ पर नर्मदा-भक्त भरपूर आस्था के साथ गतिमान हैं।

रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी, सकल सिद्धि सुख संपति राशि, इन शब्दों के जरिये नर्मदा और रामकथा दोनों शिव को एक समान प्रिय होने का रहस्य उद्घाटित किया था। जबकि बाल्मीक रामायण में वनवास अवधि में श्रीराम के नर्मदा तट तक पहुंचने का बिंदु रेखांकित हुआ।

तमसा पार कर रामवन पहुंचे, फिर नर्मदा की ओर चल दिए

श्रीराम वनवास अवधि में सर्वप्रथम अयोध्या से महज 20 किलोमीटर दूर स्थित तमसा नदी नाव से पार की। इसके बाद श्रृंगेश्वर तीर्थ पहुंचे, जिसे अब सिंगरौर कहा जाता है। वहां गंगा पार करने के लिए केवट के साथ संवाद किया। गंगा पार होकर श्रीराम कुरर्द गांव में रुके। फिर प्रयाग पहुंचे, जिसे अब प्रयागराज (इलाहाबाद) कहा जाता है। प्रयाग संगम के समीप श्रीराम ने यमुना नदी को पार किया और पहुंच गए चित्रकूट। यह वही स्थान है, जहां श्रीराम को वनवास से अयोध्या वापस लौटाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंच गए थे, और फिर भरत-मिलाप हुआ। यहां से कुछ दूरी पर सतना स्थित अनुसुइया पति महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे और रामवन नामक स्थान पर विश्राम किया। इसके बाद श्रीराम के चरण नर्मदा की ओर बढ़े।

जबलपुर के रेवा तट को मिला सौभाग्य

भौगोलिक दृष्टि से नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से लेकर विसर्जन स्थल खंभात की खाड़ी तक के संपूर्ण प्रवाह-पथ में से श्रीराम के चरण जिस नर्मदा-तटीय क्षेत्र पर पड़े, सौभाग्यवश वह जबलपुर का किनारा था। विंध्य के रेवांचल से सटे सतना जिले की वनभूमि चित्रकूट से होते हुये श्रीराम जाबालिपुरम अर्थात आज के जबलपुर के सुरम्य नर्मदांचल में वनवास-काल का कुछ समय काटने चले आये। नर्मदा सिद्धिदात्री सरिता हैं, अतः श्रीराम ने यहां विशेष साधना-आराधना भी की थी।

सरयू किनारे वाले ने नहीं किया पुण्यसलिला का लंघन

इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार कुल 14 वर्ष के वनवास-काल में श्रीराम 200 से अधिक स्थानों पर रुके। सरयू किनारे वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जब जबलपुर के नर्मदा तट पर पहुंचे तो उन्होंने अपरिणीता सरिता कलकल निनादिनी पुण्य सलिला नर्मदा के प्रति अगाध सम्मान-भाव का परिचय दिया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने नर्मदा का लंघन नहीं किया। आशय यह कि नर्मदा की जलराशि को लांघे बिना तटीय परिक्रमा करते हुए जबलपुर के नर्मदा तट को अपनी चरण-रज से धन्य कर दिया। श्रीराम के इसी आदर्श को अंगीकार कर त्रेतायुग से नर्मदा-परिक्रमा की परम्परा को अविरल गति मिल गई। यह समृद्ध परम्परा आज भी बदस्तूर जारी है।

राम-आगमन की स्मृतियों के प्रतीक स्थल आज भी विद्यमान

चित्रकूट-सतना से श्रीराम का सीता और लक्ष्मण सहित जबलपुर के नर्मदा तट पर पहली बार आगमन हुआ। जबकि दूसरी बार जबलपुर के नर्मदा तट पर श्रीराम का लक्ष्मण सहित आगमन राम-रावण युद्ध की समाप्ति के बाद 'ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति की साधना के लिए हुआ। इस बार सीता उनके साथ नहीं थीं। जबलपुर के नर्मदा तट पर प्रथम आगमन के दौरान यहां का नैसर्गिक सौंदर्य राम के मन को खूब भाया था। चित्रकूट-सतना-जबलपुर से जुड़ी राम-आगमन की स्मृतियों के प्रतीक स्थल आज भी विद्यमान हैं।

नर्मदा तट से होते हुए दंडकारण्य वन में किया प्रवेश

श्रीराम जबलपुर के नर्मदा तट से प्रस्थान कर श्रीराम दंडकारण्य वन में प्रवेश कर गए, जिसका दायरा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्रप्रदेश तक फैला है। इसी अवधि में महानदी से गोदावरी तक श्रीराम के चरण पड़े। जबकि इससे पूर्व चित्रकूट में मंदाकिनी और जबलपुर में नर्मदा का सौंदर्य-लहरी श्रीराम के मानस को असीम आनंद प्रदान कर चुकी थी।

Posted By: Nai Dunia News Network

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