सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। मध्य प्रदेश में आज से 90 वर्ष पूर्व छेने के रसगुल्लों की परंपरा की शुरुआत जबलपुर से हुई थी। इसका श्रेय मिला था अमृत भंडार के संस्थापक फणीभूषण देब को, जो व्यापार स्थापित करने की मंशा से कोलकाता से जबलपुर आए थे। उन्होंने यहां मिष्ठान के व्यवसाय को गति दी तो बंगाल की सबसे खास मिठाई छेने के रसगुल्लों को मूल आधार बनाया। फिर क्या था, जबलपुर से लेकर आसपास ही नहीं बल्कि समूचे मध्य प्रदेश में जबलपुर के अमृत भंडार के छेने के रसगुल्लों की ख्याति फैल गई। दूसरी पीढ़ी के रूप में उनके पुत्र निर्बिकल्प देब ने अमृत भंडार के रसगुल्लों को कमला भोग, केसर राजभोग, केसर भोग, दूध पुड़ी, खीर पुड़ी, मलाई चाप, मोचक, खीर चमचम सहित अन्य स्वरूपों में नवाचार के माध्यम से सुप्रसिद्ध कर दिया। इसी कड़ी में जब अमृत भंडार की बागडोर तीसरी पीढ़ी के आशीष देब के हाथों में आई तो उन्होंने अमृत भंडार की मूल पहचान छेने के रसगुल्लों की इंद्रधनुषी रेंज को कायम रखते हुए कुछ और इनोवेशन किया। छेने के रसगुल्ले की गुणवत्ता को पूर्वजों की सीख के अनुरूप बरकरार रखते हुए ड्रायफ्रूट की मिठाइयों व नमकीन आदि का भी विक्रय शुरू कर दिया।

जिसने एक बार खाया, बार-बार खाने को जी ललचाया :

आशीष बताते हैं कि जिसने भी एक बार अमृत भंडार का छेने का रसगुल्ला चख लिया, यकीनन वह बार-बार इनका स्वाद लेने चला आता है। प्रतिष्ठान में एक-दो पीस खाने के बाद पैक कराकर घर ले जाता है। त्योहारों के समय तो मांग के अनुरूप आपूर्ति एक चुनौती से कम नहीं होती। एडवांस बुकिंग तक करनी पड़ती है। अमृत भंडार के छेने के रसगुल्लों की देखा देखी ही जबलपुर सहित आसपास व मध्य प्रदेश के दूसरे शहरों में भी बंगाली की मूल मिठाई छेने के रसगुल्ले बनाए जाने लगे। लेकिन अमृत भंडार की गुणवत्ता का यह स्तर है कि होल्कर अवार्ड जैसा प्रतिष्ठित सम्मान मिला। मध्य प्रदेश के मिठाई व्यवासाय से जुड़े पुराने व नए प्रतिष्ठित व्यवसायी खुले मन व दिल से यह स्वीकार करके कृतज्ञ होते हैं कि मध्य प्रदेश में छेने के रसगुल्ले सबसे पहले जबलपुर के अमृत भंडार में ही बनना व बिकना शुरू हुए थे। यही प्रशंसा जिम्मेदारी को दोगुना कर देती है और हम पूर्वजों की प्रतिष्ठा के अनुरूप छेने के रसगुल्लों को हमेशा की तरह दमदार बनाए रखने में दत्तचित्त से जुट जाते हैं।

Posted By: tarunendra chauhan

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