सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। लंकाधिपति रावण से युद्ध की समाप्ति के बाद श्रीराम का अनुज लक्ष्मण सहित जबलपुर के नर्मदा तट पर पुनरागमन हुआ था। उनका पहला जबलपुर आगमन वनवास अवधि से संबंधित था, जबकि दूसरा ब्रह्महत्या के दोष से निवृत्ति की साधना से। इस संबंध में स्कंदपुराण के रेवाखंड में रोचक कथा वर्णित है, जिसके अनुसार श्रीराम-लक्ष्मण ने हनुमान के अधिक समय तक अज्ञातवास में रहने का कारण पूछा। इस पर हनुमान ने बताया कि वे नर्मदा तट पर प्रकृति हत्या व ब्रह्महत्या के दोष का निवारण करने साधनारत थे।

रुद्रावतार होने के कारण जब वे हिमालय स्थित शिवधाम कैलाश पहुंचे, तो द्वार पर नंदी ने रोक लिया और कहा कि रावण की अशोक वाटिका उजाड़ने के साथ लंका दहन करने और महापंडित रावण के वंशजों की हत्या के कारण प्रकृति व ब्रह्महत्या का दोष लगा है, जिससे निवृत्ति के लिए सिद्धिदात्री नर्मदा के तट पर साधना कीजिए। इसके बाद ही शिवधाम में प्रवेश के अधिकारी होंगे। अत: नंदी के परामर्श के अनुरूप मैंने नर्मदा किनारे एक शांत और सुंदर स्थान खोजकर वहां साधना शुरु कर दी, जिसके बाद दोनों दोषों से मुक्ति मिल गई। जब कैलाश पहुंचा तो नंदी ने स्वागत-सत्कार के साथ शिव-दर्शन सुलभ करा दिए।

श्रीराम-लक्ष्मण ने भी नर्मदा तट की ओर से प्रस्थान किया

हनुमान से सारी कथा सुनकर श्रीराम-लक्ष्मण ने भी ब्रह्महत्या के दोष से निवृत्ति का संकल्प लिया। वे हनुमान के साथ उसी स्थान पर पहुंचे, जहां साधना करके उन्होंने प्रकृति व ब्रह्महत्या के दोष का निवारण किया था। जबलपुर के लम्हेटाघाट नामक किनारे के दूसरी ओर लम्हेटीघाट स्थित है, जहां नाव से पहुंचा जा सकता है। उसी स्थान पर कपितीर्थ में श्रीराम-लक्ष्मण ने सर्वप्रथम बालुका (रेत) से एक-एक शिवलिंग निर्मित किया। दोनों शिवलिंग एक जिलहरी में प्राणप्रतिष्ठित किए गए। राम द्वारा निर्मित शिवलिंग आकार में बड़ा जबकि लक्ष्मण का शिवलिंग छोटा है। वर्तमान में एक प्राचीन मंदिर में यह शिवलिंग स्थापित है। इस स्थान को अब श्रीरामेश्वर-लक्ष्मणेश्वर-कुंभेश्वर कपितीर्थ के नाम से जाना जाता है।

अपनी तरह का एकमात्र जुड़वा शिवलिंग अस्तित्व में आया :

त्रेता के महानायक विष्णु-अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और शेषनाग के अवतार अनुज लक्ष्मण द्वारा त्रिपुरारी शिव का पूजन करने के लिये स्थापित किये गये जुड़वा शिवलिंग अस्तित्व में आने के साथ ही शिव-भक्तों की आस्था के केंद्र बन गये थे। त्रेतायुग से शुरू हुई उनके पूजन की परम्परा कलयुग में भी अनवरत जारी है। जबलपुर के लम्हेटाघाट नामक नर्मदा तट पर जो भी नर्मदा-भक्त पहुंचते हैं, उनकी दृष्टि बरबस ही उस पार स्थित लम्हेटीघाट स्थित रामेश्वर-लक्ष्मणेश्वर-कुंभेश्वर कपितीर्थ मंदिर के शिखर की ओर उन्मुख हो जाती है। इस तीर्थ-स्थल के आसपास नीलगिरी पर्वत, सूर्य कुंड, शनि कुंड, इंद्र गया कुंड, ब्रह्मा विमर्श शिला, बलि यज्ञ स्थली सहित काफी संख्या में आस्था के प्रतीक स्थल विद्यमान हैं।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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