नगरीय निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद अगर सबसे ज्यादा कोई मुसीबत में हैं तो वे हैं जनप्रतिनिधि और संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारी। एक अनार और सौ बीमार जैसे हालातों के बीच टिकट वितरण हुआ। सूची जारी होते ही तय आशंका के बीच बवाल कटने लगा। दबाव में कुछ नाम बदले भी गए और कुछ को निराश हाथ लगी। इसी जद्दोहद के बीच जिले के एक माननीय के सबसे नजदीकी होने का दंभ भरने वाले नेताजी ने अपनी पत्नी के नाम टिकट मांगा था। सालों पुराने संबंध और नजदीकी होने का स्टीकर चिपकाकर घूमने वाले पूर्व पार्षद के होश उस समय उड़ गए, जब सूची से पत्नी का नाम गायब दिखा। दौड़े-दौड़े माननीय के पास पहुंचे। आश्वासन मिलने की बजाय दो टूक जवाब मिला कि अब न हो पाएगा। फिर क्या था सालों तक सेवादार रहे नेताजी ने पहले अपनी पत्नी और फिर खुद ने झाड़ू को थाम लिया।

बत्ती पर धोखा...

आधुनिक मशीनों का उपयोग करने का दंभ भरने वाले अधिकारी सिग्नल तंत्र को काबू नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि आए दिन शहर के प्रमुख चौराहों के पर लगी बत्तियां याददाश्त खो रही हैं। सिग्नल के लिए लगी टाइमर मशीन में 120 से 70 सेकंड तक का स्टापेज टाइम दर्ज है। इन मशीनों की देखरेख नहीं होने से हालात यह हैं कि सेकंड की घड़ी 100 से सीधे दस पर अचानक पहुंच रही है। हरा सिग्नल 15 सेकंड में ही फिर से लाल हो रहा है। ऐसे में वाहन लेकर चौराहे या तिराहे से निकल रहे वाहन चालक भी हैरान हैं कि वह अचानक से बदले समय के कारण क्या करें? खास बात यह है कि तीन पत्ती, ब्लूम चौक जैसे चौराहों पर यह सब चार महीनों से हो रहा है, पर जिम्मेदारों का ध्यान इस ओर नहीं है। लापरवाही किसी भी दिन भारी पड़ सकती है।

साफ होने लगे कमरों के जाले

लगभग ढाई से बंद पड़े नगर निगम के कुछ कमरों के जाले अब हटने लगे हैं। कारण भी है कि महीने भर में नई नगर सरकार अपना आकार ले लेगी। इसके बाद 79 पार्षद सहित 12 मेयर इन काउंसिल सदस्य, नगर निगम अध्यक्ष और महापौर अपने-अपने कक्षों में बैठेंगे। इन सभी की बैठक होगी तो निश्चित रूप से निगम में काम से आने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए निगम के बंद पड़े कमरों को अब खोला जाकर सफाई कराई जा रही है। सभाकक्ष तो लगभग तीन वर्षों से बंद है। नगर सरकार का गठन होते ही सबसे पहले यहीं बैठक होगी। पार्षदों की संख्या बढ़ने के बाद यहां की बैठक व्यवस्था में भी बदलाव करना होगा। माइक समेत अन्य उपकरण भी सुधारे जा रहे हैं। निगमकर्मी भी खुश हैं कि ढाई साल से मंद पड़ी व्यवस्था कम से कम चहल-पहल तो बढ़ेगी।

सुरूर में सिंडीकेट, मुसीबत में कर्मचारी

शहर में हमेशा चर्चा में रहने वाला शराब का सिंडीकेट इस बार इसके बिखराव के लिए चर्चा में है। एक अप्रैल से वित्तीय वर्ष शुरू होने के साथ ही सभी दुकानें पूरी क्षमता के साथ खुल गईं हैं। दो महीने तक अपने दम पर दुकान चलाने वाले ठेकेदारों ने बेमन से सिंडीकेट बनाया। सालों तक इस सिंडीकेट के प्रमुख रहे 'अंकल ने इस बार असमर्थता जताई। जैसे-तैसे रसूखदार रहे एक पूर्व पार्षद को इस शर्त पर तैयार किया कि वे सिर्फ मुखिया बने रहें, काम टीम संभालेगी। सिंडीकेट तैयार होते ही दुकानों से नियमित वसूली करने वाले सामने आ गए कि अब महीना बांध दो, उनसे निपटे तो वीआइपी जिम्मेदारी आ गई। मुश्किल से संभले ही थे कि निकाय चुनाव आ गए। अब हर वार्ड का प्रत्याशी सिंडीकेट तक की तरफ मुंह किए हुए है। संकट में चल रहा सिंडीकेट ग्रुप खुद सुरूर में है कि करें तो क्या करें?

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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