Bajnamath Mandir Jabalpur: ब्रजेश शुक्ला, जबलपुर। जबलपुर का बाजनामठ भैरव मंदिर तंत्र साधना के लिए जाना जाता है। इस मंदिर को देश के प्रमुख मंदिरों में गिना जाता है। पहाड़, तालाब के साथ ही इस मंदिर से प्राकृतिक नजारा देखते ही बनता है। यहां पूजन के लिए वैसे तो हर दिन भक्त पहुंचते हैं, लेकिन शनिवार और रविवार को यहां बड़ी संख्या में भक्तों का जमावड़ा रहता है। मेडिकल कालेज के आगे बने इस मंदिर की बनावट भी अद्भुत है। जो हर मंदिर में देखने नहीं मिलती। क्योंकि इसकी हर ईंट शुभ नक्षत्र में मंत्रों द्वारा सिद्ध करके जमाई गई है। ऐसे मंदिर पूरे देश में कुल तीन हैं, जिनमें एक बाजनामठ तथा दूसरा काशी और तीसरा महोबा में हैं।

बाजनामठ का निर्माण 1520 ईस्वी में राजा संग्राम शाह द्वारा भैरव मंदिर के नाम से कराया गया था। बताते हैं कि उनके राज्य में ये मंदिर अतिप्रचलित था और राज्य के ज्यादातर लोग यहां पूजन करने आते थे। कहते हैं कि इस मठ के गुंबद से त्रिशूल से निकलने वाली प्राकृतिक ध्वनि-तरंगों से शक्ति जागृत होती है। भक्त बताते हैं कि बाजनामठ में पूजा-अर्चना से लोगों को चमत्कारिक लाभ हुए हैं। यहां तेल व पुष्प चढ़ाने से शनि व राहु की पीड़ा से राहत मिलती है। इसी उम्मीद से हजारों की संख्या में भक्त आते हैं और उनकी मुराद पूरी भी होती है।

यह है खासियत

मंदिर में एक भी छेद नहीं है, जिसकी वजह से यहां हल्की सी आवाज भी गूंजने लगती है। अंदर भगवान शिव के अंश भैरव की मूर्ति है। मंदिर में प्रवेश करते ही धुआं और अंधेरा नजर आता है। यहां से निकलने के लिए भी एक ही दरवाजा है। यहां आने जाने वाले भक्त बम बम बम की आवाज से अपनी आस्था प्रकट करते हैं। भक्त भैरव बाबा को झंडे भी चढ़ाते हैं।

इतिहास और आध्यात्म का समावेश

इस मंदिर से जितना आध्यात्म का जुड़ाव है उतना ही इतिहास का भी समावेश है। आध्यात्मिक दृष्टि से जहां इस मंदिर में पूजन पद्धति शैव परंपरा से जुड़ी है वहीं मंदिर का रखरखाव और मूर्ति शिल्प कल्चुरिकाल से जुड़ा है। गोंड शासकों ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। राजा संग्राम शाह यहां विशेष रूप से पूजन करने आते थे।

राजा संग्राम शाह को मिला था आशीर्वाद

गोड शासक संग्राम शाह स्वयं यहां पूजन करने आते थे। वे भैरव के बड़े भक्त थे और उनके आशीर्वाद से ही वे कभी कोई युद्ध नहीं हारे। कहा जाता है कि यहां उन दिनों कई तांत्रिक क्रियाओं को संपन्न् किया जाता था। जिसकी वजह से रात को भी मंदिर में आवागमन बना रहता था।

यह है मान्यता

आदि शंकराचार्य के भ्रमण के समय उस युग के प्रचण्ड तांत्रिक अघोरी भैरवनंद का नाम अलौकिक सिद्धि प्राप्त तांत्रिक योगी के रूप में मिलता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार भैरव को जागृत करने के लिए उनका आह्वान तथा उनकी स्थापना नौ मुण्डों के आसन पर ही की जाती है, जिसमें सिंह, श्वान, शूकर, भैंस और चार मानव-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इस प्रकार नौ प्राणियों की बली चढ़ाई जाती है। किंतु भैरवनंद के लिए दो बलि शेष रह गई थी। यह भी माना जाता है कि बाजनामठ का जीर्णोद्धार सोलहवीं सदी में गोंड़ राजा संग्राम सिंह के शासन काल में हुआ, किंतु इसकी स्थापना ईसा पूर्व की है। बाजनामठ के विषय में एक जनश्रुति यह भी है कि एक तांत्रिक ने राजा संग्राम सिंह की बलि चढ़ाने के लिए उन्हें बाजनामठ ले जाकर पूजा विधान किया। राजा से भैरव मूर्ति की परिक्रमा कर साष्टांग प्रणाम करने को कहा, राजा को संदेह हुआ और उन्होंने तांत्रिक से कहा कि वह पहले प्रणाम का तरीका बताए। तांत्रिक ने जैसे ही साष्टांग का आसन किया, राजा ने तुरंत उसका सिर काटकर बलि चढ़ा दी।

ऐसे हुई भैरव की उत्पत्ति

शिवपुराण के अनुसार कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्यान्ह में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। अत: इस तिथि को भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार अंधकासुर नामक दैत्य अपने कृत्यों से अनीति व अत्याचार की सीमाएं पार कर रहा था, यहां तक कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव तक के ऊपर आक्रमण करने का दुस्साहस कर बैठा। तब उसके संहार के लिए शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई।

आदि शंकराचार्य ने भी किया था पूजन

चौसठ योगिनी और 81 भूत, प्रेत, पिशाचों को जाग्रत करने का यह विशेष स्थान है। जहां तंत्र साधना की शिक्षा दी जाती थी। उस समय तंत्र साधना को जाग्रत करने के लिए भैरव मंदिर को विशेष स्थान बनाया गया था। शिव के गण के रूप में भैरव को जाग्रत किया जाता है। यहां आदि शंकराचार्य ने भी पूजन किया था। - स्वामी डा. मुकुंददास महाराज, गुप्तेश्वर पीठाधीश्वर

देश में भैरव के 17 सर्वप्रमुख तांत्रिक मंदिर हैं जिसमें जबलपुर का मंदिर अद्भूत एवं अद्वितीय है। त्रिपुरी में शैव मत की स्थापना से यहां पूजन हो रहा है। गोलकी मठ तांत्रिक विश्वविद्यालय का यह मंदिर प्रमुख अध्ययन केंद्र रहा है। गोंड शासकों का इतिहास देखा जाए तो इस मंदिर का निर्माण सन 1520 में महाप्रतापी राजा संग्राम शाह ने कराया था। इसे विश्व विरासत में शामिल किया जाना चाहिए। - डा. आनंद सिंह राणा, इतिहासकार

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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