ब्रजेश शुक्ला, जबलपुर। जबलपुर को नर्मदा तट और संगमरमर की वादियों के लिए ही नहीं बल्कि दशहरा के लिए भी पहचाना जाता है। यहां एक नहीं बल्कि दस से ज्यादा रावण के पुतलों का दहन किया जाता है। जबलपुर का दशहरा इसलिए भी खास है क्योंकि यहां तीन दिनों तक चल समारोह निकाला जाता है। शहर में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरूआत 1829 में गलगला से हुई लेकिन रामलीला का मंचन 1865 में मिलौनीगंज से शुरू हुआ। इसी के साथ चल समारोह और रावण दहन की परंपरा भी शुरू हुई। इसके बाद समय के साथ-साथ उपनगरीय क्षेत्रों में रामलीलाओं का मंचन बढ़ा तो चल समारोह के साथ ही रावण के पुतलों की संख्या भी बढ़ गई। 158 साल में शहर में 12 चल समारोह निकलने लगे हैं। कोलकाता के दुर्गा पूजन और मैसूर के प्रसिद्ध दशहरा पर्व की तरह जबलपुर के दशहरा पर्व को भी प्रसिद्धि मिल रही है। इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु सड़क पर उमड़ते हैं।

1829 में पहली दुर्गा प्रतिमा की स्थापना : गलगला क्षेत्र के दत्ता साहेब के बाड़े में 1829 में पहली बार सार्वजनिक प्रतिमा की स्थापना की गई। यहां बंगाली परिवारों ने मिलकर प्रतिमा रखी थी। उस समय यहां शहर के उच्च वर्गों के साथ अंग्रेज परिवार पूजन में शामिल होते थे। इसके बाद बंगभाषियों की संख्या बढ़ी तो शहर में कई स्थानों पर काली बाड़ी की स्थापना की गई। वर्तमान में लगभग पांच हजार से ज्यादा प्रतिमाए रखी जाती हैं।

1865 में रामलीला के मंचन से शुरू हुआ दशहरा पर्व: शहर में सबसे पहले दशहरा पर्व की शुरूआत श्री गोविंदगंज रामलीला समिति मिलौनीगंज द्वारा की गई। इसके साथ ही शहर में दशहरा पर्व की शुरूआत हो गई। यही जबलपुर का मुख्य चल समारोह था। इसमें शामिल होने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचने लगे। धीरे-धीरे शहर में सुनरहाई और नुनहाई के साथ कई प्रतिमाओं की स्थापना की जाने लगी। इससे चल समारोह की भव्यता बढ़ने लगी। 90 के दशक में चल समारोह में इतनी प्रतिमाएं शामिल होती थी कि हनुमानताल में पहली प्रतिमा का विसर्जन सुबह 6 बजे होता था। पहले चल समारोह सुपर मार्केट से शुरू होता था। इसके बाद चल समारोह नगर निगम के सामने से शुरू होने लगा। जिसकी अगुवाई श्री गोविंदगंज रामलीला समिति करती है। रामलीला द्वारा राम-रावण का युद्ध के साथ ही विविध विषयों पर कटाक्ष करती झांकी आकर्षण का केंद्र रहती हैं।

समय के साथ बढ़ते गए चल समारोह: आबादी बढ़ने के साथ ही दुर्गा प्रतिमाओं की संख्या बढ़ी तो रामलीला का मंचन भी अन्य क्षेत्रों में होने लगा। 1910 में गोकलपुर क्षेत्र में रामलीला बेचू पाण्डेय ने शुरू की। तब मुकुटों को कागज से बनाया गया था। तब भगवान की बरात बैलगाड़ी में निकलती थी। सौ साल पूरे करने के बाद कुछ व्यवधान आया लेकिन मंचन फिर शुरू हो गया। इसी तरह सदर में श्री धनुष यज्ञ रामलीला की शुरूआत वर्ष 1881 में क्षेत्र के प्रतिष्ठित परिवारों ने की थी। वहीं गिरजाशंकर रामलीला समिति घमापुर द्वारा 74 वर्ष से रामलीला का मंचन किया जा रहा है। इस रामलीला को क्षेत्रीय लोगों ने शुरू किया था। श्री आदर्श रामलीला समिति अधारताल द्वारा 1968 में रामलीला शुरू की गई थी। तब किशन प्रसाद शुक्ला, लक्ष्मी प्रसाद शुक्ला, भगवानदास केवट, हरि प्रसाद शुक्ला, मनमोहन पांडे आदि ने मंचन छोटे स्तर पर शुरू किया था। मुख्य चल समारोह के दूसरे दिन गोहलपुर से चल समारोह अधारताल तक निकाला जाता है। नव मित्र समाज रामलीला समिति वीकल फैक्ट्री इस्टेट में नौ मित्रों ने मिलकर 53 साल पहले रामलीला का मंचन शुरू किया, इसलिए समिति का नाम नव मित्र रखा गया। वहीं श्री गोविंदगंज रामलीला से प्रेरणा और सहयोग लेकर 1967 में श्री रामलीला समिति गढ़ा जाबालिपुरम ने मंचन शुरू किया। मुख्य दशहरा के दूसरे दिन यहां चल समारोह निकाला जाता है। उपनगरीय क्षेत्र रांझी की बात करें तो श्री सनातन धर्म सभा, राधा कृष्ण मंदिर द्वारा 70 वर्षो ंसे चल समारोह के साथ रावण पार्क में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। इसी तरह गढ़ा पुरवा, कांचघर और गोरखपुर से चल समारोह निकाला जाता है।

1950 से पंजाबी दशहरा की शानः पंजाबी हिंदू एसोसिएशन द्वारा 1950 से दशहरा की शुरूआत की गई। 1950 में छोटी ओमती स्थित पेशकारी स्कूल में सबसे पहले रावण का दहन किया गया। इसके बाद 1953 से घंटाघर के पास एनसीसी मैदान में दशहरा मनाया गया। कार्यक्रम में लोगों की संख्या को देखते हुए इसके कुछ वर्षों बाद आयोजन पंडित रविशंकर शुक्ल स्टेडियम में किया जाने लगा। लेकिन न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद वर्तमान में यह आयोजन आयुर्वेदिक कालेज मैदान ग्वारीघाट में मनाया जाता है। जहां विशालकाय रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों को जलाया जाता है।

ये हैं शहर के मुख्य समारोह

- मुख्य चल समारोह

- पंजाबी दशहरा

- सदर दशहरा

- रांझी दशहरा

- गढ़ा दशहरा

- अधारताल दशहरा

- वीकल फैक्ट्री का दशहरा

- गोकलपुर दशहरा

- कांचघर दशहरा चल समारोह

- घमापुर दशहरा

-गोरखपुर चल समारोह

- पुरवा दशहरा चल समारोह

मंचन से युवा पीढ़ी भी आकर्षित

मध्य भारत के प्राचीनतम श्री गोविंदगंज रामलीला समिति मिलौनीगंज के अध्यक्ष अनिल तिवारी बताते हैं कि चल समारोह की भव्यता हर साल बढ़ रही है। जबलपुरवासी भी अब शान से कहते हैं कि हमारा दशहरा पर्व देश में सबसे अलग है। यहां दुर्गा प्रतिमाओं के दर्शन के साथ ही रामलीलाओं का ऐसा मंचन देखने मिलता है जो युवा पीढ़ी को भी आधुनिकता के दौर में आकर्षित करता है। बुजुर्गों ने जो हमें विरासत में सौंपा है हम सभी उसका पालन कर रहे हैं।

देश में सबसे अच्छा स्वरूप

श्री रामलीला समिति गढ़ा जाबालिपुरम के संयोजक अशोक मनोध्याय बताते हैं कि शहर में रामलीला का स्वरूप के साथ दुर्गा पूजन भी महत्वपूर्ण है। जिस तरह राम ने शक्ति की आराधना कर रावण का दहन किया था। उसी तरह शहर में लोग दुर्गा पूजन कर रामलीला में शामिल होते हैं। शहर में दुर्गा प्रतिमाओं के बढ़ने पर चल समारोह समितियां बनाई गई और रामलीला समितियों ने अगुवाई की। देश में सबसे अच्छा दशहरे का स्वरूप संस्कारधानी में ही दिखाई देता है। हर चल समारोह में प्रतिमाएं बढ़ती जा रही हैं।

Posted By: Jitendra Richhariya

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