अनुकृति श्रीवास्‍तव जबलपुर। शहर में ऐसी कई गलियां, चौराहे और बाजार हैं जिनका अपना एक इतिहास है। इनके बनने की, बसने की और नामों के पड़ने की अपनी एक अलग कहानी है। शहर के ऐसे ही एक बाजार गुरंदी की कहानी भी बड़ी रुचिकर है। गुरंदी बाजार की खासियत के बारे में कहा जाता है कि यहां ऐसा कुछ नहीं जो न मिलता हो। यह विशेषता अंग्रेजों के समय से चली आ रही है और अभी तक जारी है। शहर के इतिहासविद डॉ. आनंद सिंह राणा से मिली जानकारी के अनुसार आइए जानते हैं कि क्या है गुरंदी बाजार की कहानी।

शहर से जुड़े इतिहास में जब भी ठगों का नाम लिया जाता है तो कर्नल स्लीमन का नाम खुद-ब-खुद जुबान पर आ जाता हैं एक समय शहर में ठगों का बहुत आतंक था। ठग इतने कठोरे होते थे कि वे लूटते भी थे और जान से भी मार दिया करते थे। ऐसे ही ठगों को पकड़ा, आतंक खत्म किया और उन्हें सजा दी कर्नल स्लीमन ने। लगभग दो हजार ठगों को फांसी पर लटकाया गया। धीरे-धीरे ठगों का आतंक कुछ कम हुआ।

इनमें से कुछ ठग ऐसे थे जो कर्नल स्लीमन के साथ हो गए। उन्होंने सुधरना चाहा तो स्लीमन ने भी उनके पुनर्वास का प्रयास किया। इसी प्रयास के चलते गलगला तालाब को पूर कर बाजार बनाया गया। जिसमें ठगों की इच्छानुसार उन्हें सामान बेचने की अनुमति दी गई। अब कहते हैं न कि आदतें इतनी जल्दी नहीं छूटतीं। यहां भी यही हुआ। बाजार था तो आखिर ठगों का ही। इसलिए देश भर के कई स्थालों से लाया जाना वाला नया-पुराना सभी तरह का सामन यहां बेचा जाने लगा।

ठगों के पुनर्वास की दिशा में किए गए इस प्रयास में ठगों व उनके बच्चों की जीविका के अन्य साधन जुटाने के लिए स्लीमन व कैप्टन ब्राउन ने 1838 में स्कूल ऑफ इंडस्ट्री या दरीखाना नाम संस्था आरंभ की। जिसमें ठग व उनके परिवार के सदस्य विभिन्न रोजगार धंधों को प्रशिक्षण प्राप्त कर सम्मान से जीवन यापन कर सफल नागरिक बनें। उन्हें इस स्कूल में ईंटे बनाना, लाख का सामान, रंग-रोगन का काम, कंबल, गलीचा, कालीन- बुनाई व सिलाई का काम सिखाया गया। इस दरीखाने में बने टेंटों की मांग देश भर से आया करती थी। महारानी विक्टोरिया ने भी 80 बाय 40 का एक गलीचा बनवाया था। जो उनके विंडसर महल में बिछाया गया था। अंग्रेजों को भी किसी मोटर पार्ट या किसी ऐवी वस्तुत की जरूरत होती थी जो और कहीं नहीं मिलती थी, तब वे भी गुरंदों (ठगों)के इस बाजार में जाया करते थे।

ठगों की सामूहिक समाप्ति के बाद एक मजदूर कॉलोनी बनाई गई थी। जिसमें जो ठग मुखबिर बन गए थे वे सम्मानपूर्वक जीवन बिता सकें, रहते थे। यही कॉलोनी रिफॉरमेट्री स्कूल की जन्मदात्री थी। क्योंकि इस स्थान पर गुरंदे अपने परिवार के साथ रहते थे। उनके बच्चे जो कि गुरिंदे कहलाते थे यहां काम करते थे। इन गुरिंदों के कारण अपभ्रंश होते-होते बाजार का नाम गुरंदी पड़ गया। जो अभी तक गुरंदी के नाम से ही जाना जाता है।

Posted By: Ravindra Suhane

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