सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव अधिवक्ता परितोष त्रिवेदी ने बताया कि एक दशक पूर्व किसानों को न्याय दिलाकर उन्हें बड़ा सुकून मिला था। उन्होंने नर्मदा कुंभ के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण से हलकान 500 किसानों को मुआवजा दिलाया था। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक अधिवक्ता के रूप में मैंने 1999 में पदार्पण किया था। 2011 तक मेरी वकालत एक दशक पुरानी हो चुकी थी। इसी दौरान मंडला में नर्मदा कुंभ का आयोजन हुआ। इसके लिए मंडला के 500 किसानों की कृषि भूमि तो अधिग्रहित कर ली गई किंतु उसके एवज में मुआवजा आदि का कोई प्रविधान नहीं किया गया। लिहाजा, जाहिर तौर पर किसान हलकान थे। उन्हें चिंता इस बात की थी कि नर्मदा कुंभ के कारण एक सीजन की खेती उनके हाथ से निकल जाएगी। जिससे होने वाले नुकसान की भरपाई बेहद मुश्किल होगी। इतना ही नहीं नर्मदा कुंभ के दौरान खेतों का मूल स्वरूप बिगड़ जाएगा, जिसे पूर्ववत करने में काफी समय व धन खर्च होगा। यदि मुआवजा नहीं दिया गया तो वे बर्बाद हो जाएंगे।

नारायण सिंह जाट सहित अन्य की ओर से दायर की जनहित याचिका :

हाई कोर्ट में वकालत शुरू करने के साथ जबलपुर निवासी हो गया किंतु मैं मूलत: मंडला निवासी हूं। चूंकि किसानों का मामला मेरे गृह नगर मंडला का था, अत: भावनात्मक लगाव के साथ इस समस्या को समझा। मेरे पास फोन से सूचना आने के अलावा कुछ किसान पहुंचे। वे बेहद परेशान थे। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके खेतों पर रोड रोलर चलाने के बाद गड्ढे करके तंबू ताने जा रहे हैं। इस वजह से कल तक खेतों की उर्वर भूमि अब सपाट नजर आने लगी है। सारे खेत गिट्टी-रेत-सीमेंट से भर गए हैं। ट्रकों की आवाजाही से मेढ़ टूट गई हैं। सभी पुरानी पगडंडियां नजर आनी बंद हो गई हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि खेत ही सड़क बना दिए गए हैं। बहरहाल, किसानों की पीड़ा सुनने के बाद मैंने गंभीरतापूर्वक जनहित याचिका दायर करने की सलाह दी। मंडला अंतर्गत माली मोहगांव लखन टोला निवासी किसान नारायण सिंह जाट सहित अन्य इसके लिए तैयार हो गए। लिहाजा, उनके नाम से जनहित याचिका दायर कर दी गई।

हम नर्मदा कुंभ के विरोधी नहीं, हमें मुआवजा चाहिए :

हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली युगलपीठ के समक्ष जनहित याचिका की सुनवाई शुरू हुई। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ही मैंने स्पष्ट कर दिया कि जनहित याचिकाकर्ता मूलत: किसान हैं और वे नर्मदा किनारे खेती करके जीवन-यापन करते चले आ रहे हैं। वे सभी नर्मदा भक्त हैं। इसलिए नर्मदा कुंभ के विरोधी नहीं हैं। वे इस आयोजन के समर्थक हैं। किंतु उनकी मूल चिंता यह है कि उनके खेतों की दुर्दशा के बाद सुधार कार्य कौन करेगा। यदि शासन-प्रशासन इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता हैं तो उन्हें ही सुधार कराना पड़ेगा। इस प्रक्रिया में काफी खर्च आएगा। साथ ही नर्मदा कुंभ के कारण एक सीजन की खेती नहीं हो पाएगी। अतएव, भविष्य में खेतों के सुधार में खर्च होने वाली राशि के अलावा फसल न उगा पाने से होने वाले नुकसान की भी भरपाई के लिए मुआवजा अपेक्षित है।

राज्य शासन की ओर से सकारात्मक रुख सहयोगी बना :

सबसे खास बात यह रही कि राज्य शासन की ओर से पक्ष रखने तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, जो वर्तमान में महाधिवक्ता हैं, खड़े हुए थे। उन्होंने सकारात्मक रुख प्रदर्शित किया। हाई कोर्ट को बताया कि शासन-प्रशासन किसानों को नुकसान पहुंचाने के हक में नहीं है। यही वजह है कि उनकी समस्या व शिकायत दूर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। शीघ्र ही बेहतर परिणाम सामने आएंगे। इस अभिवचन को अभिलेख में लेकर हाई कोर्ट ने आगामी सुनवाई तिथि तक पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की व्यवस्था दे दी। फिर क्या था बीच की अवधि में किसानों को उनकी अपेक्षा से भी अधिक मुआवजा दिए जाने की प्रक्रिया पूर्ण कर ली गई। जैसे ही यह जानकारी हाई कोर्ट में प्रस्तुत हुई, मूल मांग पूरी होने के आधार पर जनहित याचिका का निराकरण कर दिया गया। इस तरह मंडला के जिन 500 किसानों के चेहरों का रंग कल तक उड़ा हुआ था, वह अब इंद्रधनुषी आभा लिए नजर आ रहा था। साथ ही मेरा ह्दय भी सुकून से भर गया था। इसीलिए यह मेरा यादगार मुकदमा है।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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