जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। यदि पुलिस स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ है, तो वह जनता की रक्षा कैसे करेगी। उसे चाहिए कि आत्मरक्षा के लिए सदैव तैयार रहे। ऐसा न होने पर उसकी भूमिका कठघरे में आ जाती है। सरेआम पुलिस पर हमले अनुचित हैं। पुलिस को चाहिए कि वह स्वयं को मजबूत करे। हमला होने पर आत्मरक्षा की दिशा में सचेत रहे। इस तरह स्वयं को कमजोर दिखाकर हास्य की पात्र न बने। इससे समाज में उसकी छवि खराब होती है। इस मामले में लगाए गए आरोप तक साबित नहीं हुए। इससे पुलिस को आत्म अवलोकन की दिशा में सक्रिय होना चाहिए।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने एक आपराधिक प्रकरण में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आत्मरक्षा में पुलिस द्वारा प्रतिकार नहीं करना, उसकी नाकामी दर्शाता है। इस मामले में न तो पुलिस के पास कोई ठोस स्पष्टीकरण है और न ही ठोस प्रमाण। यही नहीं एमएलसी रिपोर्ट और एफआइआर में दिए बयान भी परस्पर मेल नहीं खा रहे हैं। लिहाजा, पुलिस आरक्षक पर हमला करने के आरोपित युवक शैलेन्द्र सिंह रावत को राहत दी जाती है।

दरअसल, जनवरी, 2022 में भोपाल के बिलखिरिया थानांतर्गत सार्वजनिक स्थान पर हंगामा हुआ था। मौके पर भोपाल निवासी शैलेन्द्र व उसका भाई मौजूद था। आवेदक की ओर से अधिवक्ता अभय पांडे ने बताया कि पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया। आरोप है कि इसी दौरान शैलेन्द्र ने पुलिस आरक्षक अरुण मेहर पर लात-घूंसों से हमला बोल दिया। पुलिस ने दोनों भाईयों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई। अधिवक्ता पांडे ने दलील दी कि एमएलसी रिपोर्ट में आया कि पुलिस आरक्षक पर किसी धारदार हथियार से हमला किया गया है।जबकि एफआइआर में लात-घूंसों से हमला व गर्दन के पास नोचने का तथ्य दर्ज किया गया था। इस तरह एमएलसी व एफआइआर के तथ्य परस्पर विरोधाभासी हो गए। ऐसे में दोष मुक्त किए जाने का आधार बनता है।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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