जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगे जाने पर कोताही अनुचित है। मुख्य सूचना आयुक्त को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। इस तल्ख टिप्पणी के साथ जुर्माना लगाया गया। साथ ही भविष्य में ऐसी गलती न करने की ताकदी दी गई। हाई कोर्ट ने शासकीय कर्मी को उसके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति की जानकारी आरटीआई के तहत जानकारी नहीं देने पर मुख्य सूचना आयुक्त पर दो हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।

प्रशासनिक न्यायाधीश शील नागू व न्यायमूर्ति अरुण कुमार शर्मा की युगलपीठ ने कहा कि आवेदक को आरटीआई का अावेदन करने, प्रथम व दि्तीय अपील पर भी जानकारी नहीं मिली। इससे त्रस्त होकर आवेदक को मजबूर होकर कोर्ट का दरवाजा खटखटना पड़ा। कोर्ट ने कहा कि लोक सूचना अधिकारियों ने इस बात की जांच नहीं की कि प्रकरण में जांच पूरी हो गई है और कोर्ट में चालान भी पेश हो चुका है। इसके बाद प्रथम व द्वितीय अपीलीय अधिकारी ने भी इस तथ्य को जांचे बिना अपीलें खारिज कर दीं, इसलिए उच्चतम अधिकारी को इसका हर्जाना भुगतना होगा। कोर्ट ने सीआईसी को 60 दिन के भीतर जुर्माने की राशि आवेदक को अदा करने के निर्देश दिए और ऐसा नहीं होने पर याचिका स्वत: जीवित हो जाएगी।

स्टेट जीएसटी जबलपुर में पदस्थ रहे कर्मचारी प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने याचिका दायर कर बताया कि उस पर भ्रष्टाचार का आरोप है। वर्तमान में याचिकाकर्ता निलंबन अवधि में है और नरिसंहपुर में पदस्थ है। भोपाल की विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त भोपाल ने 2018 में याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रकरण पंजीबद्ध किया था। श्रीवास्तव ने आरटीआई के तहत अभियोजन स्वीकृति की कापी मांगी थी। अधिकारी ने यह दलील दी कि प्रकरण कोर्ट में लंबित है, इसलिए कॉपी नहीं दी जा सकती। वहीं शासन की ओर से बताया गया कि 20 जून, 2020 में ही उक्त प्रकरण में चार्जशीट पेश हो चुकी है और सूचना आयोग ने 28 जुलाई को जानकारी देने से इनकार किया है।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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