जबलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि। गुरुनानक देव के 550वें प्रकाश पर्व की बात हो तो नर्मदा तट जबलपुर के गुरुद्वारा ग्वारीघाट का उल्लेख भी इतिहास के पन्नों में मिलता है। जब 1509 ईस्वी के आसपास गुरुनानक देव के चरण ग्वारीघाट क्षेत्र में पड़े थे। तब पुरानी सड़क ग्वारीघाट से होते हुए नागपुर को जाती थी। तब गुरुनानक देव ने नर्मदा पार की थी।

ग्वारीघाट नर्मदा के बांए किनारे पर ऋषि सरबंग रहते थे

ज्ञानी ज्ञान सिंह ने रिखनपुर अभिलाषी का विशेष तौर पर उल्लेख किया है। क्योंकि ग्वारीघाट नर्मदा के बांए किनारे पर ऋषि सरबंग रहते थे। सरबंग ऋषि का नाम भविख वाणी की पुस्तक में भी आया है। इस ऋषि को दर्शन देने और रूहानी ज्ञान का सही रास्ता दिखाने के लिए गुरुनानक देव इधर आए थे। सतबीर सिंह और पुरातन जन्म साखी के लेखक ने नर्मदा नदी के किनारे पर ही कुछ ठगों के उद्धार करने का प्रसंग भी लिखा है।

गुरुद्वारा ग्वारीघाट साहिब में दर्शन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं

वर्तमान में यहां गुरुद्वारा ग्वारीघाट साहिब सुशोभित है। जहां दर्शन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। नर्मदा परिक्रमावासियों के साथ ही सिख संगतों का यहां आगमन होता है।

विशेष दीवान सजाया जाता है हर रविवार

प्रत्येक रविवार को यहां विशेष दीवान सजाया जाता है। इसके अलावा होला महल्ला होली का विशेष आयोजन किया जाता है। जिसमें शहर के बाहर से भी लोग शामिल होते हैं। नर्मदा तट पर बने इस गुरुद्वारा में गुरुनानक देव का प्रकाश पर्व पर अनेक कार्यक्रम आयोजित हुए हैं। जिसमें अनुयायियों ने लंगर का प्रसाद ग्रहण किया।

Posted By: Hemant Upadhyay