जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। गुरु पूर्णिमा पर शिष्‍यों ने गुरु चरणों में अपनी आस्‍था व्‍यक्‍त की। सुबह से शाम तक आश्रमों और धर्मस्‍थलों पर गुरु पूजन के लिए शिष्‍य पहुंचते रहे। हाथों में आस्‍था की थाल और जय गुरुदेव के नारे हर जगह सुनाई दे रहे थे। शहर के शंकराचार्य मठ से लेकर ग्‍वारीघाट तटों पर बने आश्रमों में शिष्‍य कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए गुरु पूजन कर रहे थे।

शंकराचार्य मठ मढ़ाताल : मढ़ाताल स्थित शंकराचार्य मठ में सुबह से पादुका पूजन करने वाले शिष्‍य पहुंचते रहे। यहां शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद सरस्‍वती का पादुका पूजन ब्रह्मचारी स्‍वामी चैतन्‍यानंद महाराज की उपस्थिति में शिष्‍यों द्वारा किया गया। इस दौरान भागवत कथा के समापन पर यज्ञ में आहुति दी गई। इसी तरह स्‍नेह नगर में स्‍वामी राघवदेवाचार्य का पूजन शिष्‍यों द्वारा किया गया। नरसिंह मंदिर में साकेतवासी स्‍वामी रामचंद्र शास्‍त्री और स्‍वामी श्‍यामदेवाचार्य की पादुकाओं का पूजन शिष्‍यों ने किया। गुप्‍तेश्‍वर स्थित स्‍वयं भू गुप्‍तेश्‍वर महादेव मंदिर और भोलेकुटी आश्रम में भी गुरु पूजन परंपरानुसार किया गया।

सामान्य बोध हम सभी को होता है : शंकराचार्य चौक स्थित समन्‍वय सेवा केंद्र में साकेतवासी स्‍वामी सत्‍यमित्रानंद गिरि महाराज का पादुका पूजन शिष्यों द्वारा किया गया। इस दौरान महामंडलेश्‍वर स्‍वामी अखिलेश्‍वरानंद गिरि ने कहा कि अंधकार में प्रवेश करना किसी को भी अच्छा नहीं लगता। सामान्य अंधेरा हो तो व्यक्ति संभलकर आगे बढ़ने का यत्न करता है। यह सोचकर कि मैं शीघ्र प्रकाश के सम्पर्क में। आ जाऊं। भौतिक दृष्टि से अंधकार और आलोक का सामान्य बोध हम सभी को होता है किन्तु हमारे पूज्य संतों, गुरुजनों का अनुभव सिद्ध ज्ञान जब हमें मिलता है तब हमारे संज्ञान में आता है कि आध्यात्मिक जगत में भी अंधकार होता है और वह है अज्ञानान्धकार, अज्ञान का अंधकार। यह अज्ञान का अंधकार ज्ञान के प्रकाश से ही दूर होता है। सूर्य के प्रकाश की महिमा हम सभी को ज्ञात है। सूर्य का अर्थ ही है प्रकाश पुंज। सूर्य की यह प्रकाशपूर्ण तेजस्विता , सम्पूर्ण जगत को आलोकित करती है। सूर्य के उजाले में ही हम आप सभी प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। कल्पना कीजिए यदि सूर्य न होता तो हम जगत के विभिन्न पदार्थों से कैसे परिचित हो पाते। संसार के व्यक्ति, वस्तु, स्थानों का आकार-प्रकार, रूप-रंग कैसा है? चित्र-विचित्रात्मक विधाता की यह विशाल सृष्टि, यह सब हम सूर्य के प्रकाश में ही देख पाते हैं। अंधेरे में तो हम सर्प को भी रस्सी मानकर स्पर्श करते परंतु सर्प की फुफकार मात्र से तो हमारे होश ही उड़ जाते हैं। इसलिए हम प्रकाश की महिमा से भली भांति सुपरिचित हैं।

Posted By: Brajesh Shukla

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