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जबलपुर। मैरीकॉम ने देश के लिए ब्रांज मैडल जीता हम भी ओलंपिक में जाएंगे और इंडिया के लिए गोल्ड लेकर जाएंगे। ये जोश, आत्मविश्वास और निडरता भरे भाव साफ देखने मिलते हैं शहर की महिला बॉक्सर में। आज जब देश के लिए ओलंपिक में ब्रांज मैडल जीतने वाली महिला बॉक्सर के जीवन पर आधारित फिल्म 'मैरीकॉम' रिलीज हो रही है। तो इन बॉक्सर में कुछ अलग ही खुशी दिखाई दे रही है। अपनी आदर्श के जीवन पर बनी फिल्म आने पर इन सभी का कहना है कि हमें भी मैरीकॉम की तरह बनना है। इसलिए मैरीकॉम के जीवन को और भी नजदीक से देखने के लिए हमने फिल्म का फर्स्ट डे फर्स्ट शो बुक करा लिया है।

कठिन तो है पर मुश्किल नहीं

रानीताल स्टेडियम में बॉक्सिंग के कोच परमजीत सिंह ने बताया कि जब से मैरीकॉम ने ओलंपिक में मैडल जीता है शहर में लड़कियों में बॉक्सिंग सीखने के लिए रुझान बढ़ा है। बॉक्सिंग सीखना कठिन तो है पर मुश्किल नहीं है। लड़कियों को यदि उनके माता-पिता का सहयोग मिले तो वह इस क्षेत्र भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।

कई तरह की भ्रांतियां

लड़कियों बॉक्सिंग ज्यादा नहीं सीखतीं इसके पीछे कई कारण हैं। जानकार मानते हैं कि पेरेन्ट्स को डर रहता है कि बॉक्सिंग करने से चोट के कारण लड़कियों का चेहरा खराब हो जाएगा। जबकि ऐसा कुछ होता नहीं है। जिस प्रकार हर खेल की तकनीक होती है उसी तरह बॉक्सिंग की भी अपनी तकनीक हैं।

सेल्फ डिफेंस में सहायक

राइट टाउन स्टेडियम में बॉक्सिंग के कोच वीरेंद्र सिंह ठाकुर ने बताया कि लड़कियां बॉक्सिंग कम सीखती हैं। जबकि लड़कियों के लिए बॉक्सिंग सीखना सेल्फ डिफेंस की तरह काम करता है। इसके अलावा यदि कोई लड़की किसी से बोल भर दे कि वो बॉक्सर है तो सामने वाले अपने आप ही खुद को कमजोर समझने लगते हैं। लड़कियों के लिए यह खेल चैलेंजिंग है इसलिए उन्हें इस खेल में आना चाहिए। मैरीकॉम ने निश्चित तौर पर बॉक्सिंग का क्रेज बढ़ाया है। अब लोगों को लगने लगा है कि लड़कियां भी बॉक्सिंग कर सकती हैं।

शहर में प्रशिक्षण

शहर में तीन स्थानों पर बॉक्सिंग का प्रशिक्षण दिया जाता है। रानीताल स्टेडियम, राइट टाउन स्टेडियम और मॉडल स्कूल में। मॉडल में स्कूल की तरफ से बॉक्सिंग सिखाई जाती है।

कुछ छोड़ भी देती हैं

कोच ने बताया कि ऐसी कई लड़कियां भी हैं जो कुछ दिनों तक तो बॉक्सिंग करती हैं लेकिन बीच में छोड़ भी देती हैं। इसमें भी कारण उन्हें पूरा सपोर्ट न मिलना है। जबकि शहर में बॉक्सिंग सीखने के लिए जो सुविधाएं चाहिए उनका अभाव नहीं है।

वर्जन

तुम मुझसे भी अच्छा करना

मैं 2012 में नेशनल के दौरान भोपाल में मैरीकॉम से मिली थी। मुझे गर्व है कि मैं मेरीकॉम से मिल चुकी हूं और उन्हें मेरी बॉक्सिंग पसंद आई थीं। मैरीकॉम ने मुझसे कहा था कि तुम मुझसे भी अच्छा करना। वो मैं कभी नहीं भूलती। मैरीकॉम बनने के लिए निश्चित तौर पर हमें मेहनत तो करना पड़ती हैं। यहां कोई शॉर्टकट नहीं है। मैं अभी दसवीं क्लास में हूं और मुझे आगे बढ़ाने में माता- पिता का सहयोग मिल रहा है।

शिवांगी ठाकुर, बॉक्सर

मैरीकॉम ही मेरी आदर्श

मैंने जब टीवी पर देखा कि किस तरक मैरीकॉम ने देश के लिए ब्रांज जीता तो मुझे भी बॉक्सिंग सीखने की इच्छा जागी। तब से मैं बॉक्सिंग सीख रही हूं। अच्छा लगता है यहां आकर रोज प्रेक्टिस करना। शाम को 5 से 8 बजे तक अभ्यास होता है। अब डर नहीं लगता और कॉन्फिडेंस लेबल भी बढ़ा है। मेरे पिता यशवंत गढ़ेवाल और मां शिवानी गढ़ेवाल मुझे बहुत सपोर्ट करते हैं।

देवयानी गढ़ेवाल, बॉक्सर

कुछ अलग हैं हम

बहुत कम लड़कियां बॉक्सिंग सीखती हैं इसलिए मैंने सीखा क्योंकि हम दूसरों से कुछ अलग हैं। हम देश के लिए कुछ अच्छा और अलग करना चाहते हैं। मैरीकॉम तो सभी बॉक्सर की फेवरेट हैं। आज फिल्म देखना है और बस देश के लिए मैडल जीतना है।

आकांक्षा ठाकुर, बॉक्सर

अब नियमित नहीं हूं

मैंने पहले बॉक्सिंग नियमित सीखी है लेकिन अब नियमित नहीं हो पाती। मुझे बॉक्सिंग करना अच्छा लगता है लेकिन टाइम भी बहुत देना पड़ता है। मेरा मानना है कि लड़कियां यदि चाह लें तो किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं जैसे मैरीकॉम ने देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है।

अंकिता बठीजा, बॉक्सर

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