जबलपुर,नईदुनिया प्रतिनिधि। हाई कोर्ट ने अधिसूचित क्षेत्र में नियमानुसार ग्राम सभा की सहमति के बिना बांध के लिए भूअधिग्रहण के रवैये को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर जवाब-तलब कर लिया है। मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमठ व न्यायूर्ति विशाल मिश्रा की युगलपीठ ने इस सिलसिले में राज्य शासन, प्रमुख सचिव राजस्व, केंद्र शासन, ग्रामीण विकास मंत्रालय, प्रमुख सचिव जल संसाधन, आदिवासी विभाग, सिंचाई विभाग, संभागायुक्त जबलपुर, कलेक्टर डिंडौरी, मुख्य अभियंता बाणगंगा बेसिन, सिवनी, अधीक्षण अभियंता जल संसाधन विभाग, उप संभागीय अधिकारी राजस्व डिंडौरी व तहसीलदार डिंडौरी को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।

मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमठ व न्यायूर्ति विशाल मिश्रा की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। जनहित याचिकाकर्ता डिंडौरी निवासी कृषक ध्रुव परस्ते, कंधी सिंह मरकाम, नर्मदा प्रसाद मरकाम, दीप सिंह आर्मो, केहर सिंह, पुनिया बाई, समर सिंह, राम सिंह, पतिराम सिंह, आधार सिंह, नारायण सिंह बनवासी व गोपाल प्रसाद गोप की ओर से अधिवक्ता जीएस उड्डे व दिनेश त्रिपाठी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि 10 अगस्त, 2016 व 24 नवंबर, 2016 को अधिसूचना जारी की गई। इससे पूर्व पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की सहमति लेने की अनिवार्यता को दरकिनार कर दिया गया। यही नहीं संवैधानिक व विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई की जा रही है। इससे व्यथित होकर प्रभावित कृषकों ने जनहित याचिका दायर करने का निर्णय लिया।

क्या है प्रविधान :

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-244-एक में अनुसूचित जनजाति अनुसूचित क्षेत्रों में भूअर्जन के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण से पूर्व प्रत्येक ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है। इसके बावजूद अंडई, डूंगरिया, विट्ठल देव परियोजना की अधिसूचना मनमाने तरीके से जारी कर दी गई। धारा-40 इमरजेंसी क्लाज के अंतर्गत बिना किसी समुचित कारण के कार्रवाई शुरू कर दी गई। डिंडौरी अनुसूचित क्षेत्र है, जहां के गरीब किसान फसलों की बुवाई कर अपना जीवन-यापन करते हैं। कृषि ही इन आदिवासी कृषकों की आमदनी का जरिया है। इसलिए मनमाने तरीके से बांध निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण पर रोक लगाई जानी चाहिए।

Posted By: Jitendra Richhariya

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