सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। संस्कारधानी में मढ़ाताल गुरुद्वारा के सामने से गुजरने वालों को अक्सर इमरती व कचौड़ी की सुगंध बरबस ही अपनी ओर खींच लेती है। यह सुगंध पिछले 40 वर्ष से होटल भाई-भाई की मूल पहचान है। यहां की इमरती व कचौड़ी जो एक बार चख लेता है, वह बार-बार खाने खिंचा चला आता है। इमरती व कचौड़ी ही नहीं यहां सुबह से लेकर रात तक मिलने वाली चाय भी बेहद खास होती है। इसके साथ सुबह पोहा-जलेबी और दोपहर में भाजीबड़ा, समोसा, आलूबंडा खाने वालों की कमी नहीं है। शाम को ताजा बालूशाही के साथ कचौड़ी खाकर चाय पीने वाले ग्राहक एकदम पक्के हैं। जबलपुर ही नहीं आसपास के इलाकों से भी यहां आकर इमरती व कचौड़ी खाने वाले अनेक ग्राहक हैं। यहां तक कि शहर से बाहर जाने वाले अपने रिश्तेदारों की फरमाइश पर दूसरे शहरों व विदेशों तक यहां की इमरती व कचौड़ी ले जा चुके हैं।

कमल के बाद दिनेश व अखिलेश की जुगलबंदी :

इन दिनों दिनेश व अखिलेश अवस्थी होटल भाई-भाई का मिलकर संचालन कर रहे हैं। इस प्रतिष्ठा की शुरूआत उनके बड़े भाई कमल अवस्थी ने की थी। भाईचारा कायम रखने की जो सीख उनसे मिली थी, वह अनवरत कायम है। सबसे खास बात यह कि बड़े भाई के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान संचालन सूत्र का अनुसरण करते हुए साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखा जाता है। पेयजल से लेकर बर्तनों की सफाई तक कोई कोताही नहीं बरती जाती। इससे ग्राहक आकर्षित होते हैं। वे मित्रों के बीच यहां की साफ-सफाई की तारीफ करते नहीं अघाते।

सुबह छह से रात नौ बजे तक परिश्रम :

भाई-भाई मिलकर सुबह छह से रात नौ बजे तक इस प्रतिष्ठान का संचालन करने में पूर्ण मनोयोग से जुटे नजर आते हैं। रात में फुलाकर रखी गई मूंग की दाल का मसाला तैयार किया जाता है, जो कचौड़ी की जान है। मैदा से लेकर तेल व मसालों तक प्रत्येक सोपान पर शुद्धता का पूरा ख्याल रखा जाता है। इमरती सहित अन्य पकवान बनाने वाले हलवाई स्नान-पूजन उपरांत ही कड़ाहे के सामने बैठते हैं। सर्वप्रथम भगवान का भोग निकाला जाता है, इसके बाद पहले ग्राहक से बोहनी होती है।

त्योहारों पर अग्रिम आदेश लिए जाने की परम्परा :

भैरव अष्टमी व शनि अमावस्या पर भाई-भाई की इमरती की मांग सर्वाधिक होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि भैरव व शनि भक्त इमरती का भोग लगाते हैं। इसी का प्रसाद वितरित करते हैं। लिहाजा, त्योहारों पर अग्रिम आदेश लिए जाने की परम्परा बन गई है। यहां की कचौड़ी की खासियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहर के कई चिकित्सक प्रतिष्ठान में बैठक ताजी ही नहीं घर पर सुरक्षित रखकर एक-दो दिन बाद बासी कचौड़ी तक खाने के शौकीन हैं। वे ताजी की भांति बासी कचौड़ी के फायदे बताते नहीं थकते।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close