जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। ट्रेनों को साफ-सुधरा रखने के लिए रेलवे ने हर संभव प्रयास किए। हाल ही में पश्चिम मध्य रेलवे जोन ने इस ओर बेहतर काम करने हुए अपनी सभी ट्रेनों में बायोटॉयलेट लगा दिए। अकेले जबलपुर रेल मंडल के 450 से ज्यादा कोचों में बायोटायलेट लगाए गए, जिनमें पैसेंजर ट्रेन से लेकर दुर्घटना राहत रिलीफ ट्रेन के कोच तक शामिल हैं, लेकिन इस सुविधा ने यात्रियों की दुविधा बढ़ा दी है।

दरअसल कोच में लगाए गए बायोटॉयलेट से रेलवे ट्रैक में गंदगी नहीं हो रही, लेकिन इससे कोच में बदबू बढ़ गई है। ट्रेन रवाना होने के कुछ देर बाद ही कोच और टायलेट में गंदगी, पानी और बदबू आने की शिकायतें आने लगती हैं।

टायलेट चोक, ट्रेन लौटने में ही सफाई

जबलपुर स्टेशन से रवाना होने वाली अधिकांश ट्रेनों में टॉयलेट चोक होने वाली शिकायतें आ रही हैं, लेकिन इन शिकायतों में यह बात भी सामने आई है कि यात्रियों द्वारा टॉयलेट में गंदगी (बॉटल, कपड़ा, खाने की पॉलीथिन और अन्य चीजें) डालने से बायोटॉयलेट चोक होकर बदबू मार रहे हैं। समस्या यह है कि बीच सफर में टायलेट से बदबू आने वाली शिकायतों को स्टेशन में दूर करना संभव नहीं है। इन कोच की बनावट ऐसी है कि कोच मेंटनेंस के दौरान ही इन्हें साफ किया जा सकता है। इस वजह से यात्रियों का सफर बदबू के बीच कटता है।

टारगेट पूरा करने में बदल दिए टायलेट

पश्चिम मध्य रेलवे ने जबलपुर ही नहीं बल्कि भोपाल और कोटा रेल मंडल की सभी ट्रेनों के कोचों में बायोटायलेट लगाए हैं। ऐसा करने वाला पमरे, देश का पहला रेल जोन बना है। इसके लिए उन्हें हाल ही में दिल्ली में सम्मानित किया गया। रेलवे का मानना है कि इन टायलेट की मदद से न तो ट्रैक गंदा होगा और न ही ट्रैक पर काम करने वाले कर्मचारियों को असुविधा होगी। जहां तक यात्रियों की बात है तो इसके उपयोग और उन्हें जागरूक होना होगा, ताकि वे टायलेट में गंदगी न डालें।

जबलपुर से रवाना होने वाली सभी ट्रेनों के तकरीबन 450 से ज्यादा कोचों में बायोटायलेट लगाए हैं। इसका सही ढंग से उपयोग करने के लिए टॉयलेट में ही दिशा-निर्देश भी लगाए गए हैं, इसके बाद भी कई यात्रियों द्वारा इनमें गंदगी डाल दी जाती है, जिससे वह चोक होकर बदबू देने लगते हैं। -एसएन मिश्रा, सीनियर डीएमई कोचिंग, जबलपुर रेल मंडल