International Family Day - 2022: सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। अब शेष जीवन के लिए अंतिम सांस तक यही हमारा परिवार है।यदि अपनों के परिवार में सहारा मिला होता तो यहां क्यों आते। जिस तरह अपनों को अब हमारी कोई परवाह नहीं उसी तरह अब हमें भी अपनों को याद करने में रस नहीं रहा।

यह कहना है मध्य प्रदेश शासन पंचायत व सामाजिक न्याय विभाग के सहयोग से भारतीय रेडक्रास सोसायटी, जबलपुर द्वारा संचालित निराश्रित वृद्ध आश्रय गृह, तिलवारा रोड में रह रहीं निराश्रित वृद्धों का। परिवार का नाम सुनते ही इनकी बूढ़ी आंखों में पानी उभर आता है। सरकार व समाज की मदद से संचालित जबलपुर के वृद्धाश्रम में 25 वयोवृद्ध महिला-पुरुष रह रहे हैं।ये सब अपने परिवार की उपेक्षा के शिकार हैं। त्योहारों के दौरान ही इन्हें इनके परिवार वाले याद नहीं करते। बावजूद इसके कि इन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी परिवार के लिए सुख-सुविधाएं जुटाने में लगा दी।

आंसू किसी की याद में कितने करीब थे

दरअसल, वृद्धाश्रम में अपना बाकी जीवन गुजार रहे बुजुर्गों के मन में अपने परिवार की टीस कायम है, किंतु अब उन्होंने भी अपना कलेजा पत्थर का कर लिया है, ठीक वैसे ही जैसे अपनों ने उन्हें परित्यक्त बनाते समय किया था।बावजूद इसके जब कभी पीछे छूटे परिवार का जिक्र छिड़ता है, जो निराश्रित वृद्धों की आंखें बरबस ही नम हो जाती हैं।बिल्कुल उस शेर की मानिंद-‘आना ही था किसी का ख्याल की आंसू छलक पड़े, आंसू किसी की याद में कितने करीब थे।‘

संयुक्त परिवार के विघटन व एकल परिवार के चलन से बढ़ी समस्या

मनोवैज्ञानिक व सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि परम्परागत संयुक्त परिवारगत मूल्यों के विघटन व एकल परिवार के चलन की वजह से वृद्धाश्रम में निराश्रित वृद्धों की संख्या में इजाफा हुआ है।जबकि एक जमाने में एकजुट परिवारों में बड़े-बूढ़ों का महत्व अत्यधिक हुआ करता था। उनके मार्गदर्शन में नई पीढ़ी विकास करती थी, संस्कारवान बनती थी।

ये है दर्द

तीन साल से यहीं रह रही हूं। बेटा है नहीं, दोनों बेटियों की ससुराल में अपनी सीमा-रेखा है, इसलिए उनसे क्या उम्मीद करूं। इसलिए अब वृद्धाश्रम को ही परिवार मान लिया है।

-मीरा कोरी, 63 वर्षीय निराश्रित वृद्ध

दस साल से यहीं रह रही हूं। पति रहे नहीं। संतानें हैं नहीं। क्या आम दिन और क्या त्योहार, सब यहीं मनाते हैं। यहां के सभी बुजुर्ग ही आपस में परिवार बन गए हैं। दुख-दर्द आपस में साझा करते रहते हैं।

-मीना श्रीवास्तव,69 वर्षीय निराश्रित वूद्ध

पांच साल यहीं गुजर गए। बेटियाें की शादी हो गई। बेटा नहीं है। पति टीकाराम पांडे के साथ यहां आई थी, पिछले वर्ष उनका स्वर्गवास हो गया। अब उनकी यादों के साथ इन्हीं दरो-दीवार में आशियाना तलाशती हूं।

- मिथलेश पांडे, 68 वर्षीय निराश्रित वृद्ध

पत्नी अनुसुईया मेेरे साथ है, तो क्या कमी है। वहीं मेरा परिवार है। चार साल से साथ-साथ रह रहे हैं।मूलत: बनारस का हूं, पर पत्नी के इलाज के सिलसिले में उसके मायके जबलपुर चला अाया।शरीर मेडिकल में दान कर चुका हूं।

- प्रदीप राठौर, 79 वर्षीय निराश्रित वृद्ध

पति प्रदीप राठौर के साथ रहती हूं। मेरे भाई अब इस दुनिया में नहीं रहे, उनके परिवारजन कभी-कभी हाल-चाल जानने आते हैं।खुशी मिलती है।56 वर्ष से एक-दूजे का साथ बना है, यही बहुत है। 16 मई को हमारी शादी की 56 वीं सालगिरह है।मैं भी शरीर दान कर चुकी हूं।

-अनसुईया राठौर, 76 वर्षीय निराश्रित वृद्ध

छह माह से यहां हूं। अविवाहित हूं। इसलिए परिवार नहीं बना। भाई व भतीजे कभी आते हैं, तो दिल खुश हो जाता है।यहां रहने वाले सभी आपस में प्रेम से रहते हैं। इससे परिवार की कमी पूरी हो रही है।

- कैलाश नारायण अवस्थी,65 वर्षीय निराश्रित वृद्ध

पिछले डेढ़ साल से यहां रह रहा हूं। मेरा अपना कोई सहारा नहीं है। बेसहारा हूं।समाज में खुद को अकेला पाया था, पर यहां अकेलापन कभी महसूस नहीं होता। इन सबके बीच खुशी तलाशता रहता हूं।

- सुंदरलाल कोरी, 82 वर्षीय निराश्रित वृद्ध

परिवार ने अपना नहीं समझा।सद्भाव की जगह दुत्कार मिली। इससे दिल टूट गया। पर अब यहां मंदिर में सुबह-शाम पूजन में परमानंद मिल रहा है। यहां सब प्रेम से रहते हैं। इससे पुराने जख्म भर रहे हैं।

- साधना अग्रवाल, 59 वर्षीय निराश्रित वृद्ध

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बेटा-बहू को सास-ससुर के प्रति अधिक संवेदनशील बनना होगा। ऐसा न होने पर आज का किया कल खुद पर बीतने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।इन दिनों यही देखने को भी मिल रहा है।

-अजय पटेल, समाजसेवी

Posted By: Shivpratap Singh

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