अतुल शुक्‍ला, जबलपुर। चॉकलेट, नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। बात बचपन की हो या फिर पचपन की, इसका स्वाद लेने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं है। अब तक तो चॉकलेट हम और आप ही पसंद करते हैं, लेकिन अब इसका स्वाद पशुओं को भी बहुत लुभा रहा है। हालांकि इनकी चॉकलेट का स्वाद और साइज, दोनों ही हमारी चॉकलेट से बहुत अलग है। प्रदेश के एक मात्र वेटरनरी विश्वविद्यालय, जिसे हम नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के नाम से जानते हैं, उनके पशु विज्ञानियों ने एक ऐसी चॉकलेट तैयार की है, जो स्वाद, साइज में ही नहीं बल्कि पौष्टिकता में भी बेहतर है, जिसे कैटल चॉकलेट नाम दिया गया है। इन दिनों इसकी चर्चा जबलपुर से लेकर भोपाल तक हैं। विवि ने इसकी गुणवत्ता को बेहतर बनाने के बाद इसे आइएसओ दिलाने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी।

वीसीआई ने परखा, अब आइसीएआर लेगा क्लास: परीक्षा सिर्फ विद्यार्थियों को ही नहीं देनी होती बल्कि इसका सामना विश्वविद्यालय को भी करना पड़ता है। वेटरनरी विश्वविद्यालय जल्द ही एक परीक्षा देने जा रहा है। यह परीक्षा कोई ओर नहीं बल्कि भारतीय कृषि अनुसंध्ाान परिषद के अनुभवियों की टीम लेगी, जिसमें विवि और चारों महाविद्यालय को अव्वल आना हर हाल में जरूरी है। अव्वल आने के बाद ही विवि की मान्यता का सफर आगे बढ़ेगा। इन दिनों विवि से लेकर जबलपुर, रीवा, महू वेटरनरी कॉलेज के जिम्मेदार परीक्षा की तैयारियों में दिन-रात पसीना बहा रहे हैं। हालात यह है कि त्यौहार का रंग भी तैयारियों की वजह से फीका पड़ गया है। हर विभाग अपने नंबर बढ़ाने के लिए रिपोर्ट तैयार करने में जुटा है, ताकि परीक्षा में अव्वल आ सकें। विवि का फिशरी कॉलेज पहली बार इस परीक्षा में भाग लेने जा रहा है ताकि बिगड़ती साख को बचा सकें।

बाप-बेटे की बिगड़ी साख से लगा संघ को बट्टा: साख बनती तो सालों में है, लेकिन बिगड़ने में चंद मिनट लगते हैं। पश्चिम मध्य रेलवे का एक कर्मचारी संघ इन दिनों खासी चर्चा में है। चर्चा की वजह उसकी साख ही है। अब तक संघ की डोर संभाल रहे पिता ने संघ में न सिर्फ अपनी दावेदारी मजबूत की बल्कि रेलवे में नौकरी न करने वाले बेटे को संघ में डोर थमाते हुए सालों से काम कर रहे कर्मचारी नेताओं के ऊपर बिठा दिया। पिता-पुत्र के बढ़ते व्यक्तिगत हितों से परेशान संघ के नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया और दोनों को संघ के पदों से मुक्त कर बाहर का रास्ता दिखा दिया। इतना ही नहीं जो नेता रेलवे से कर्मचारी हितों के लिए भिंडते थे, वो इन दिनों संघ को बचाने के लिए पिता-पुत्र का काला चिठ्ठा खोलने के लिए रेलवे से लेकर पुलिस तक जा पहंुचे हैं।

शराबी कम हो या न हो, पर खपत बढ़नी चाहिए: पेट्रोल महंगा हो या खाने का तेल, लोगों को हर हाल में इसे खरीदना ही पड़ता है। यही हाल शराब के साथ भी है। लोगों की जेब में नोटों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन जब बात इसे खरीदने की बात होती है तो वे कहीं न कहीं से पैसों का जुगाड़ कर ही लेते हैं। यही वजह है कि शराब महंगी होने के बाद भी दुकानों में खरीददारों की भीड़ कम नहीं हो रही है। हालांकि श्ाराब की बिक्री के आंकड़ों से प्रदेश सरकार खुश नहीं है यह बात हम नहीं बल्कि इन दिनों सोशल मीडिया में वायरल हो रहे एक पत्र से बया हो रही है। सोशल मीडिया में एक पत्र जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें वाणिज्यिक कर विभाग ने आबकारी आयुक्त को पत्र भेजकर शराब की खपत बढ़ाने के लिए वीडियो कांफ्रेंस रखने कहा है।

Posted By: Ravindra Suhane

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