रामकृष्ण परमहंस पांडेय, जबलपुर। विदेशों से पढ़ाई कर लौटे डाक्टरों की डिग्री कोरोना महामारी के दौर में चर्चा का विषय बन रही है। क्योंकि कोविड उपचार की अनुमति पाने लिए अस्पतालों में एमडी डिग्रीधारी डाक्टर का होना अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे हालात में वे एमडी डिग्रीधारी डाक्टर खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं जिन्होंने देश में पढ़ाई कर एमडी की डिग्री हासिल की थी। वे दो टूक कहते हैं कि रूस, चीन समेत अन्य देशों से मेडिकल की डिग्री हासिल करने वालों का स्वयं के नाम के साथ एमडी डाक्टर लिखना अनुचित है। असल में वे फारेन मेडिकल ग्रेजुएट हैं। उनका स्वयं को एमडी डाक्टर लिखना भारतीय चिकित्सा परिषद की धारा 14 एवं 15 के तहत दंडनीय है। उनकी डिग्री एमबीबीएस के समान है पर एमबीबीएस नहीं है। विदेश से पढ़ाई कर आने वाले अपने नाम के साथ एमडी यानि मेडिकल डाक्टर लिखें। इधर, कई मेडिकल डाक्टर एमडी बनकर मरीजों की नब्ज टटोल रहे हैं।

चौकी का विरोध कर बेलबाग भागा: भरतीपुर में सामुदायिक भवन के सामने पुलिस चौकी का निर्माण शुरू होते ही अपराधी तत्वों के पेट में दर्द होने लगा। ये वही जगह है जहां चोरी के वाहनों को काटकर अपराधी उन्हें खुर्दबुर्द करते आ रहे थे। अन्य आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिया जाता रहा। चौकी का निर्माण शुरू होते ही एक अपराधी तत्व का नाला प्रेम जाग गया। उसने आपराधिक गतिविधियों में भागीदार नौकर को समाजसेवी बना दिया। और उससे जहां तहां शिकायतें करवाने लगा कि प्राकृतिक नाला खुर्दबुर्द किया जा रहा है। उसे जब एहसास हुआ कि अब दाल नहीं गलने वाली तो बेलबाग की तरफ भाग गया। एक ’हकले’ कबाड़ी ने उसे शरण दे दी। पता चला है कि अब वह हकले की जमीन पर चोरी के वाहन कटवा रहा है जिसके हिस्सा बांट में खाकी का रंग भी चोखा हो रहा है। बहरहाल आम नागरिक बेसब्री से चौकी के लोकार्पण का इंतजार कर रहे हैं।

एएसपी बनने लगाया जोर: फरियादियों की पीड़ा दूर करने के लिए अधीनस्थों से भी भिड़ जाने वाले मिलनसार आइपीएस अधिकारी रोहित काशवानी के तबादले के बाद एएसपी शहर बनने के लिए जोर आजमाइश शुरू हो गई है। यह कुर्सी पाने के लिए कटनी से पीएचक्यू खदेड़े गए एक अधिकारी तथा पूर्व में जबलपुर में एसडीओपी रहे दूसरे अधिकारी दावेदारी ठोंक रहे हैं। लेकिन जो ज्यादा चर्चा में हैं वे अपने नाम के आगे डाक्टर लिखते हैं। एसडीओपी रहते हुए उन्होंने अपनी क्षमता का लोहा मनवा दिया था। उन्होंने यह साबित कर दिया था कि पुलिस कुछ भी कर सकती है। असल में पदस्थापना के दौरान वे स्वयं रेत माफिया बन गए थे। रेत ठेकेदारों व माफिया से उनका चोली दामन का साथ रहा। जबलपुर में पदस्थ उनके कुछ करीबी अधिकारी भी उनकी पदस्थापना के लिए नेताओं का दरबार कर रहे हैं। वे सब कथित तौर पर रेत कारोबार में पार्टनर थे। देखना यह है कि किसके भाग्य का पिटारा खुलता है।

जिसके नाम पर लिए वह बेखबर: स्वास्थ्य विभाग में विभागीय पदोन्नति बंद है। परंतु जिला मलेरिया कार्यालय के एक कर्मचारी ने दूसरे कर्मचारी को पदोन्नति दिलाने के लिए अधिकारी के नाम पर 50 हजार रुपये ऐंठ लिए। पैसे देने वाला कर्मचारी खुश था कि जल्द ही उसे पदोन्नति का लाभ मिलने वाला है। परंतु विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक हुई न कर्मचारी का पद बढ़ा। असंतुष्ट कर्मचारी ने अधिकारी व पैसे लेने वाले कर्मचारी को बदनाम करना शुरू कर दिया। जिसके बाद अधिकारी को इस लेनदेन का पता चला। उन्होंने पैसे देने व लेने वाले दोनों कर्मचारियों को तलब कर लिया। जिसने पैसे दिए उसे फटकार लगाई कि मेरे नाम पर पैसा दिए क्यों। जिसने रकम हड़पी थी उसकी गोपनीय चरित्रावली पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। पेंच अभी फंसा हुआ है। कर्मचारी जिद पर अड़ा है कि जब तक उसकी सीआर पर साहब के हस्ताक्षर नहीं होंगे, उनके नाम पर ली गई रकम वह वापस नहीं करेगा।

Posted By: Ravindra Suhane

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