कॉलम- कह गए साहब- अतुल शुक्ला, जबलपुर नईदुनिया। जब बात सुरक्षा की हो तो हम तकनीक का सहारा लेते हैं, लेकिन इससे भी बात न बने तो अंतिम रास्ता भगवान की शरण में जाने का ही बचता है। अब जबलपुर के रेल मंडल को ही ले लो। रेलवे के अधिकारी नए साल में खुश कम-दुखी ज्यादा हैं। उनके दुख का कारण, वह रेल दुर्घटनाएं हैं, जो इन दिनों रुकने का नाम नहीं ले रहीं हैं। इन घटनाओं से बड़े साहब की साख पर ऐसा बट्टा लगा है कि अब रातों की नींद ही खो गई। साहब जहां अपना टर्म पूरा कर जाने की तैयारी में जुटे थे, वहीं अब रात को पटरियों पर निरीक्षण करने में जुट गए हैं। परेशान साहब, इंजन से पटरी तक घूम-घूम पर खामी तलाश रहे हैं। इधर, साहब के शिष्य इन दिनों भगवान की शरण में चले गए हैं और हवन-पूजन कर अगली-पिछली गलतियों की माफी मांग रहे हैं।

नाम डुबोकर चलते बने प्रोफेसर बाबू :

नाम और काम, यह दो चीज हमेशा इंसान के साथ परछाईं की तरह रहती हैं। हम इनसे कितना भी दूर जाएं, पर यह हमारा साथ नहीं छोड़तीं। अब कृषि शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालय को ही देख लो। छात्रों को शिक्षा और दीक्षा का पाठ पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर बाबू की भावनाओं को जिस किसी ने भी मोबाइल पर सुना, वह सुनकर चौंक गया। हालांकि इन भावनाओं से प्रोफेसर बाबू भी शर्मिंदा हुए। उन्होंने अपनी शर्मिंदगी को स्वेच्छा सेवानिवृत्ति में बदल दिया और विवि को अलविदा कर दिया। अब विश्वविद्यालय के लोेग हैं, उनका मुंह कहां बंद रहता है। उन्होंने प्रोफेसर बाबू को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का पत्र देखकर आखिर यह कह दिया कि नाम और काम, डुबोकर साहब तो चल दिए, लेकिन विवि की साख, प्रोफेसर के विश्वास को वे कहां से लौटाकर देंगे। इधर, साहब की मोबाइल पर बयां की भावनाओं की तरह उनका सेवानिवृत्ति पत्र भी इन दिनों जमकर वायरल हो रहा है।

साहब के नाम से रोशन हुआ काम :

प्रशासन की गलियों में इन दिनों बड़े साहब के मिजाज के जमकर चर्चे हो रहे हैं। अब चर्चा है कि साहब का मिजाज मौसम की तरह बदलता है। साहब कभी काम को लेकर गर्म होते हैं तो कभी ठंडे भी हो जाते हैं। हां, पर सौ फीसद सच यह है कि उनके इस मिजाज का असर अधिकारियों के काम पर दिखने लगा है। साहब की नाराजगी से प्रशासन के बड़े से लेकर छोटे अधिकारी तक, काम में जुटे हैं। डर इतना है कि कोई काम करने से पीछे नहीं हट रहे। इसका असर यह हुआ कि जिस काम को लेकर जबलपुर का नाम, पीछे थे, वहीं अब प्रदेशभर में दूसरे पायदान पर आ गया है। इधर, साहब ने अब अपने अधिकारियों को दूसरे काम में लगा दिया है। उन्हें अब बकायादारों से वसूलने करने के काम में डटकर लगने कहा है।

खेत पर रेत, सब कुछ सेट :

नदी और नाले से रेत निकालने वालों के साथ इन दिनों जिम्मेदार अधिकारी लुका-छुपी का खेल खेलने में व्यस्त हैं। साहब ने जिन जिम्मेदारों को रेत और उसे निकालने वालों को पकड़ने की जिम्मेदारी दी है, लेकिन इस जिम्मेदारी को वह पूरी तरह से नहीं निभा पा रहे हैं। वे रेत तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन इसे निकालने वालों तक नहीं पहुंच पाते। इनकी तलाश में जिम्मेदारों ने पूरी ताकत लगा दी है, लेकिन मजाल है कि इन तक पहुंचा जाए। हां, पर इनकी रेत तक पहुंचकर इन्हें जब्त कर इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी ऐसे लोगों को दी जा रही है, जो हर काम में माहिर हैं। रेत निकालने वालों को पकड़ने वाला विभाग भी इन दिनों परेशान है। जहां कल तक वे आराम से फाइलों के बीच अपना दिन गुजार रहे थे, वहीं आज वह छापा मारने में व्यस्त हैं।

Posted By: Brajesh Shukla

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