कॉलम- खबरों के पीछे- देव शंकर अवस्थी, जबलपुर नईदुनिया। वो दिन और थे, जब कोरोना का एक मरीज आने पर लोग भयभीत हो जाते थे। हालांकि पहली और दूसरी लहर में भी लोग डरे नहीं थे। डरे होते तो इतने मरीज नहीं बढ़ते। वह तो लाकडाउन का डंडा था, जिससे लोग डरकर घरों में रहे। अब चूंकि लाकडाउन तो रहा नहीं इसलिए लोगों के भयभीत होने का भी सवाल नहीं उठता। ऐसी खबरें रोज आ रहीं हैं कि अब एक सप्ताह बाद पीक आने वाला है। इतने मरीज बढ़ेंगे लेकिन बाजारों की भीड़ देखकर ऐसा कतई नहीं लगता कि कोरोना उग्र रूप धारण करने वाला है। सार्वजनिक स्थलों से लेकर घरों में तक कोरोना से बचने की गाइडलाइन को एकदम धता बता दिया गया है। देखा जाए तो कोरोना से केवल वही डरा हुआ है, जिसने बीती लहरों में उसको भुगता है। बहुत अच्छा हो अन्य लोग भी उनके डर में शामिल हो जाएं तो सभी के लिए बेहतर होगा।

करोड़पति मित्र की तलाश :

यह एकदम सही है कि मित्रता बराबरी वालों के बीच ही निभती है। कोई आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति किसी गरीब को अपना दोस्त भला क्यों बनाए। अब ऐसी स्थिति आ गई कि शराब के शौकीनों को करोड़पतियों की तलाश करनी ही पड़ेगी। नई शराब नीति के तहत जो एक करोड़ का आयकर रिटर्न भरता होगा, वह होम बार लाइसेंस ले सकेगा। यानी दो बोतल से ज्यादा शराब घर पर रख सकता है। विरोधी पार्टी ने तो सवाल भी खड़ा कर दिया कि ऐसी स्थिति में शुष्क दिवस का क्या होगा। आशय साफ है कि जिसके घर पर शराब रहेगी, उसके लिए शुष्क दिवस के कोई मायने नहीं रहेंगे। वैसे भी, शराब बिक्री के आंकड़े बताते हैं कि शुष्क दिवस आने के पहले ही लोग अपने हिसाब की शराब खरीद लेते हैं। बहरहाल, जो भी हो इस निर्णय के बाद मदिरा प्रेमियों का करोड़पतियों के प्रति रुझान बढ़ना स्वाभाविक है।

चक्कर आफलाइन और आनलाइन का :

कालेजों में आफलाइन और आनलाइन परीक्षाओं का मामला इस समय जमकर गर्माया है। विश्वविद्यालय से लेकर सरकार भी परीक्षाओं को आफलाइन कराने की पक्षधर है लेकिन कुछ छात्र संगठन आनलाइन परीक्षाओं के लिए जोर दे रहे हैं। यह सही है कि कोरोना संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन इस बार जो सबसे अच्छी बात है कि वह ज्यादा असरकारी नहीं रहा। अस्पतालों में नाममात्र के मरीज हैं, जबकि घरों में अधिकांश का इलाज हो रहा है। लोग भयभीत नहीं, तो सरकार भी नहीं। वह नहीं चाहती कि एक बार फिर परीक्षाएं आनलाइन हों। छात्र क्लास में बैठकर परीक्षाएं दें, इसी में छात्रों की दूरगामी भलाई है। सरकार इसके लिए भी तैयार है कि परीक्षार्थी के कोरोना की चपेट में आने पर उसे दूसरी बार परीक्षा देने का मौका मिलेगा। दूसरी तरफ, छात्र प्रत्येक स्थिति के लिए तैयार हैं। उनकी तैयारी दोनों तरह से परीक्षा देने की है, चाहे आफलाइन हो या आनलाइन।

एक अनार, सौ बीमार, कैसे चले काम :

पद पाने की लालसा किसे नहीं होती। विशेषकर राजनीति से जुड़े लोगों में पदों को पाने को लेकर कुछ ज्यादा ही होड़ मचती है। प्रदेश की भाजपा सरकार भी विभिन्न् निगम-मंडलों में नियुक्तियां कर रही है, लिहाजा पुराने नेताओं में पदों की लालसा होना स्वाभाविक है। हालांकि दो पद तो जबलपुर के खाते में आ चुके हैं लेकिन अभी नेताओं ने आस छोड़ी नहीं है। वैसे भी, भाजपा में पार्टी के लिए जमीनी संघर्ष करने वालों की अधिकता है। ऐसे कार्यकर्ताओं ने ऐसे समय में पार्टी को अपने पसीने से सींचा है, जब देश-प्रदेश में पार्टी की कोई पूछपरख नहीं थी। और अब जबकि पार्टी को सत्ता में आए अरसा बीत गया तो ऐसे कार्यकर्ताओं की इच्छाओं का उफान मारना उचित भी है। फिरभी एक अनार, सौ बीमार वाली कहावत यहां भी सटीक बैठती है। अब जिसे जो मिल जाए यह तो तगड़े जोड़-तोड़ पर ही निर्भर करेगा।

Posted By: Brajesh Shukla

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