कॉलम- तीसरी आंख- राजीव उपाध्याय, जबलपुर नईदुनिया। स्मार्ट सिटी में सड़क की खोज आम जनता कर रही है। सड़क से गुजरते समय नजर ही नहीं आती। वह भी स्मार्ट सिटी में सड़क न दिखे तो बड़ा अजीब लगता है। शहरवासी तो यही सोचते हैं कि जब स्मार्ट सिटी के यह हाल हैं तो बाकी शहर का क्या होगा। बात भी सही है कि शहर के स्वच्छ क्षेत्र की ऐसी स्थिति तो कल्पना से परे है। वास्तविकता तो वास्तविकता होती है और वह यह है कि स्मार्ट सिटी में सड़क बनने के बाद फिर खोदाई हो रही है और सड़कें बदहाल हो चुकी हैं। राहगीर, वाहन चालक तो ठगे से हैं। मेडिकल अस्पताल में गर्दन और कमर दर्द से परेशान मरीज जब पहुंचते हैं तो उनसे डाक्टर यही सवाल कर रहे हैं कि क्या गड्ढों से ज्यादा गुजरते हो। मरीज जवाब में यही कहते हैं कि डाक्टर साहब क्या किया जाए, निकलना तो यहीं से होता है।

वेतन मिल रहा है न, समय काटो :

शासकीय आयुर्वेद अस्पताल में करने को बहुत कुछ है लेकिन कुछ होता नहीं है। मरीजों की आस यही है कि यहां दवाएं मिल जाएंगी, इलाज बेहतर हो जाएगा लेकिन दवाएं कुछ तो मिलती हैं बाकी निजी मेडिकल स्टोर हैं न। खरीदो वहां से। भर्ती करने की बात ही मत करिए। भर्ती करेंगे तो वार्ड में जाना तो पड़ेगा। अस्पताल के वार्डों में तो मरीज ही नजर नहीं आते। ऐसा लगता है कि शहर में सभी स्वस्थ हैं। हकीकत यह है कि चिकित्सक ओपीडी में ही मरीजों का इलाज कर लें वही बहुत है। मरीजों को भर्ती करने की झंझट कौन मोल ले। भर्ती करो फिर इलाज करने उपस्थित रहो। अब अलग से तो उसका वेतन मिलता नहीं है। मंशा यदि यह नहीं होती तो अस्पताल के वार्ड तो फुल रहते क्योंकि मरीज तो कोरोनाकाल में आयुष की ओर भी आकर्षिक हुआ है। खैर, अंदर से ही भावना आनी चाहिए।

वार्ड की धूल ही साफ हो जाए :

मेडिकल अस्पताल में कोरोना पीड़ितों को भर्ती करने के लिए बलून वार्ड बना तो लिया लेकिन इसका उपयोग कोरोना की दूसरी लहर में नहीं हुआ और तीसरी लहर में भी इसकी जरूरत नहीं पड़ी है। चर्चा तो अस्पताल में यही है कि कहीं जल्दबाजी में जो यह निर्णय नहीं लिया। अस्सी लाख कुछ कम तो नहीं होते। डाक्टर तो आपस में यही चर्चा करते हैं कि अच्छी बात है कि उपयोग नहीं हुआ मरीज घर में ही स्वस्थ हो रहे हैं। अब इसका उपयोग किसी अन्य बीमारी के मरीजों को भर्ती करने के लिए किया जाए तो बेहतर है। अब इसमें भी राजनीति है, धूल खाते रहें पलंग लेकिन उपयोग नहीं किया जाएगा। अंदरखाने में कर्मचारी भी यही चर्चा करते हैं कि लाखों रुपये धूल में तो न जाएं कोरोना के अलावा भी दूसरी बीमारी के मरीज भी तो हैं। इसी बहाने वार्ड की धूल ही साफ हो जाए।

कोरोना नेतागीरी तो नहीं देखता :

नेतागीरी करते समय न जाने क्यों कोरोना को दरकिनार कर दिया जाता है। पिछले दिनों कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने कई कार्यक्रम किए तो ऐसा लगा जैसे कि शहर में कोरोना है ही नहीं। प्रदेश सरकार का पुतला दहन कर रहे नेता और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी ही नहीं रही। नेताओं का तो यही कहना है कि हम जनता की आवाज उठाने के लिए कार्यक्रम कर रहे हैं। वह तो फोटो खिंचवाते समय मास्क कुछ नीचे आ जाता है। यह बात तो है कि नेताओं को चेहरा ही सबकुछ है। वे कार्यक्रम करें और मास्क के पीछे उनका चेहरा छिप जाए तो फोटो कैसे आएगा। काम से ज्यादा तो चिंता फोटो की रहती है। भाजपा युवा मोर्चा के कार्यक्रम से तो ऐसा लगा कि कोरोना गायब हो गया है। सवाल जब उठते हैं तो नेता बहाने बना देते हैं लेकिन बीमारी तो बीमारी है वह नेतागीरी नहीं देखती।

Posted By: Brajesh Shukla

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