कॉलम- कह गए साहब- अतुल शुक्ला, नईदुनिया जबलपुर। काम में डटे कर्मचारी को हर माह पगार मिलने के दिन का बेसब्री से इंतजार होता है, लेकिन जब यह इंतजार लंबा होने लगे तो उसका उत्साह ठंडा पड़ने लगता है। वह हर काम से कन्नी काटने लगता है। इन दिनों वेटरनरी विश्वविद्यालय से लेकर उससे जुड़े डिग्री और डिप्लोमा कालेजों में काम करने वाले प्रोफेसर हों या कर्मचारी, दोनों का यही हाल है। उन्हें कई माह से वेतन नहीं मिला। वे अपने काम और जिम्मेदारी, दोनों से इन दिनों बहुत निराश हैं। वे अब कहने भी लगे हैं कि बिना वेतन सब सूना-सूना लगता है। इन प्रोफेसर और कर्मचारियों का तनाव उस समय और बढ़ गया, जब उन्हें पता चला कि वेतन का पैसा देने वाले भोपाल के आला अधिकारी इन दिनों कोरोना की आड़ में घर में आराम फरमा रहे हैं। इधर, वेटरनरी प्रशासन की ओर से वेतन बांटने वाले भी वेतन न मिलने से अपने घरवालों के ताने से परेशान हैं।

भव्यता बढ़ाएगा वेटरनरी का भव्य द्वार :

बात शोध की हो या फिर पढ़ाई की, वेटरनरी विश्वविद्यालय में इन सब पर तो काम चल ही रहा है। अब रही बात विवि के प्रशासनिक भवन की भव्यता को निखारने की, तो इस पर भी काम शुरू हो गया है। विवि के प्रशासनिक भवन के मुख्य द्वार को भव्य बनाने का काम तेजी से हो रहा है। सुना है कि साहब ने इस द्वार की भव्यता को निखारने के लिए खुद ही जिम्मेदारी संभाली है। इसकी डिजाइन से लेकर इसके लंबाई-चौड़ाई तक में अनुभवियों की ही मदद नहीं ली, बल्कि देशभर के कई वेटरनरी विश्वविद्यालयों के प्रवेश द्वार का भी अध्ययन किया गया है। यह भव्य द्वार बनकर लगभग तैयार है। विवि के बड़े साहब को यह उम्मीद है कि विवि के इस भव्य द्वार से प्रवेश करने वाले हर विज्ञानी, विद्यार्थी, अतिथि से लेकर किसान को वेटरनरी विवि की भव्यता का खुद अनुभव हो जाएगा।

मत रोना, सबको होगा कोरोना :

कहते हैं कि काम करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए, लेकिन जब काम जान पर खेलकर हो तो काम करने से पहले थोड़ा सोच-समझ लेना चाहिए। हां, पर यह नियम केवल खुद के व्यवसाय पर लागू होता है, नौकरी पर नहीं। रेलवे में काम करने वाले कई कर्मचारियों का भी इन दिनों यही हाल है, वो जान जोखिम में डालकर अपनी ड्यूटी दे रहे हैं। कईयों ने इससे बचने के लिए अवकाश की अर्जी भी लगाई, लेकिन बड़े साहब ने यह कहकर उसे खारिज कर दिया कि वो अभी बीमार नहीं हुए हैं। अवकाश सिर्फ और सिर्फ कोरोना होने वाले को ही मिलेगा। फिर क्या, देखते ही देखते कई अधिकारी और कुछ कर्मचारी, कोरोना न होने के बाद भी खुद को बीमार घोषित करने में जुट गए हैं। इधर कई रेल कर्मी ऐसे भी हैं जो स्टेशन से लेकर ट्रेन तक में पूरी ईमानदारी से ड्यूटी दे रहे हैं।

साहब दफ्तर का ताला तो खुलवा दो :

ताला घर के दरवाजे पर लगा हो या फिर जुबान पर, जब तक खुल न जाए, चैन नहीं आता। अब रेलवे के मजदूर संघ का ही मामला देख लो। दो पक्षों के बीच हुए विवाद से किसी को असर हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन यूनियन के दफ्तर पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। संघ में विवाद के चलते यहां के मुख्य द्वार पर पुलिस ने ताला जड़ दिया है। अब तीन माह से ज्यादा का समय गुजर गया, लेकिन न तो यहां का ताला खुला और न ही इसे खुलवाने के लिए संघ ने आवाज उठाई। अब ताला मजदूर संघ की साख पर सवाल खड़ा कर रहा है। मंडल और जोन से जुड़े पदाधिकारी जब भी शहर आते हैं तो इस ताले के दर्शन किए बिना नहीं लौटते। वे जाते-जाते यह भी कहने से परहेज नहीं करते कि दो पक्षों के लड़ाई में आखिर इस दफ्तर के दरवाजे का क्या कसूर, जो महीनों से बंद है।

Posted By: Brajesh Shukla

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