ब्रजेश शुक्ला, जबलपुर नईदुनिया। संगमरमरी वादियों के इस शहर में जितनी मजबूत चट्टानें हैं उतनी ही मजबूती के साथ भारतीय संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है। शहर का नवरात्र और दशहरा पर्व की ख्याति अब देशभर में प्रसिद्ध है। शहर का दशहरा पर्व कोलकाता और मैसूर की तरह मनाया जाता है। देश भले ही गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा, लेकिन शक्ति आराधना के इस पर्व में अंग्रेज भी नतमस्तक हुए हैं। वर्ष 1829 में दुर्गा पूजा की शुरुआत जबलपुर में हुई। जिसके बाद इस परंपरा का निर्वाह आज भी लोग पीढ़ियों से कर रहे हैं। इसके बाद शहर में 1865 से रामलीला का मंचन शुरू हुआ जो आज भी चल रहा है। दरअसल इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य एक ही स्थल पर लोगों को एकत्रित करना था। जिसमें एक ही बार में सभी लोगों को हर तरह का संदेश दिया जा सके। धीरे-धीरे यह क्रम आस्था से जुड़ा और लोग स्वयं इकट्ठे होने लगे।

1829 में गलगला के पास रखी गई थी दुर्गा प्रतिमा : पहाड़ों से घिरे इस शहर में जब अंग्रेजों ने कदम रखे तो उन्हें अंग्रेजी में बात करने के लिए ऐसे लोगों की जरूरत पड़ी जिससे वे अपना काम कर सकें। इसके लिए अंग्रेजों ने कोलकाता से कुछ पढ़े लिखे लोगों को बुलाया और शहर में बसा दिया। जब शहर में बंग भाषी आए तो उन्होंने अपनी परंपरा का निर्वहन करते हुए शक्ति आराधना शुरू की। वर्ष 1829 में गलगला के पास दत्ता साहेब के बाड़े में बाबा साहेब ने दुर्गा प्रतिमा की स्थापना की। यही वह समय है जब शहर में दुर्गा पूजन का क्रम शुरू हुआ। उस दौरान इस पूजन में शहर के उच्च वर्गों के साथ ही अंग्रेज परिवार भी शामिल होते थे। इसके बाद बंग भाषियों की संख्या बड़ी तो उन्होंने शहर में काली बाड़ी की स्थापना की। वर्तमान में शहर में पांच हजार से ज्यादा दुर्गा प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है।

1865 में गोविंदगंज से शुरू हुआ रामलीला का मंचन : शहर में दुर्गा पूजन के बाद रामलीला की शुरुआत हुई वर्ष 1865 में गोविंदगंज क्षेत्र में श्री गोविंदगंज रामलीला समिति का गठन हुआ और तभी से यह मंचन लगातार जारी है। यही वह समय था जब शहर में दशहरा पर्व की शुरुआत हुई। इसके बाद 1910 में गोकुलपुर में श्री हरिहर रामलीला समाज ने रामलीला की शुरुआत की। जिसमें मुख्य रूप से मुकुट के लिए कागज का उपयोग किया गया। धीरे-धीरे शहर में सदर, गढ़ा और अधारताल क्षेत्र में भी रामलीला ने विस्तार किया और एक साथ शहर के चारों दिशाओं में भगवान राम की लीला का मंचन होने लगा। समय के साथ इनमें से कई रामलीला समिति आज भी नवरात्र पर्व के दौरान रामलीला का मंचन कर रही हैं।

छह बार नहीं हुआ मंचन : शहर के रामलीला के इतिहास में छह बार ऐसा अवसर आया जब मानव हित में रामलीला का मंचन नहीं किया गया। वर्ष 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय तीन वर्ष रामलीला का मंचन नहीं हुआ। इसके बाद 1964 में पाकिस्तान युद्ध के कारण एक बार मंचन नहीं हो सका। इसके बाद वर्ष 2020 कोरोना महामारी के कारण मंचन को विराम देते हुए मानस पाठ किया गया। महामारी के कारण इस वर्ष 2021 में भी समितियों ने मंचन ना करते हुए मानस पाठ करने का निर्णय लिया है।

Posted By: Brajesh Shukla

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