जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका का इस निर्देश के साथ पटाक्षेप कर दिया कि संभागायुक्त रीवा फोरलेन के लिए भूअधिग्रहण में गड़बड़ी के आरोप की जांच कराएं। जांच में जो दोषी पाया जाए उसे दंडित किया जाए।

मानेगांव से चाकघाट के बीच फोरलेन प्रस्तावित : मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद रफीक व जस्टिस संजय द्विवेदी की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान जनहित याचिकाकर्ता रीवा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता व पूर्व अध्यक्ष सेवा सहकारी समिति मर्यादित कथरा, रीवा श्रीमती श्रद्धा शर्मा की ओर से अधिवक्ता धनंजय कुमार मिश्रा ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि मानेगांव से चाकघाट के बीच फोरलेन प्रस्तावित है। इसके लिए भूअधिग्रहण मनमाने तरीके से किया गया है। इससे जनहित बाधित हुआ है। लिहाजा, स्वतंत्र जांच एजेंसी से गड़बड़ी की जांच कराई जानी चाहिए। 27 अक्टूबर, 2020 को तथ्यात्मक शिकायत के बावजूद ठोस कार्रवाई नदारत रही। इसीलिए हाई कोर्ट आना पड़ा। हाई कोर्ट ने पूरे मामले पर गौर करने के बाद जनहित याचिका का इस निर्देश के साथ पटाक्षेप कर दिया कि संभागायुक्त आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करें।

हाई कोर्ट ने महिला एडीजे के तबादले पर रोक से किया इन्कार : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, एडीजे स्वेता गोयल के तबादले पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया। हालांकि मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद रफीक व जस्टिस संजय द्विवेदी की युगलपीठ ने याचिकाकर्ता को वाजिब समय तक मौजूद जगह पर ही रहने देने संबंधी अभ्यावेदन प्रस्तुत करने स्वतंत्र कर दिया है।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता भिंड में एडीजे बतौर पदस्थ हैं। उसे 23 मार्च, 2021 को एक आदेश के जरिये कटनी में सचिव जिला विधिक सेवा समिति बतौर स्थानांतरित कर दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उसके माता-पिता वयोवृद्ध और अकेले हैं। वे गृहनगर ग्वालियर के समीप डबरा में निवास करते हैं। लिहाजा, स्थानांतरण नीति के तहत भोपाल व ग्वालियर के विकल्प को आधार बनाकर तबादला किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। बावजूद इसके कि इस सिलसिले में हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को 10 फरवरी, 2020 अभ्यावेदन सौंपा गया था। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता 21 फवरी, 2018 से भिंड में एडीजे बतौर पदस्थ है। इस तरह उसे एक जगह पर दो वर्ष से अधिक समय तक पदस्थ रखा जा चुका है। ऐसे में तबादला आदेश को चुनौती अनुचित है।

Posted By: Brajesh Shukla

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