देवशंकर अवस्‍थी, जबलपुर नईदुनिया। विदेशी आक्रांताओं से दक्षिण भारत की कला और संस्कृति संभवत: इसलिए सुरक्षित रही, क्योंकि देश के मध्य में गोंडवाना चट्टान की भांति अडिग रहा। इतिहास के पन्‍ने पलटें तो गोंडकाल में धर्म, कला, संस्कृति, संगीत और साहित्य को अच्छा बढ़ावा मिला। गोंडकाल के निर्माण, वास्तुकला आज भी गोंड राजाओं की विकसित सोच को दर्शाती है। गोंड राजवंश में शासन भले ही किसी राजा का रहा, लेकिन सभी ने हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा की संदेश दिया। गोंड राज्य की सीमाओं की दूर-दूर तक बढ़ाने का श्रेय महाराजा संग्रामशाह को जाता है। उनके शासनकाल में न केवल राज्य ने विशालता पाई, बल्कि हर क्षेत्र में सत्ता को सुदृढ़ता मिली। अनेक निर्माण कार्य हुए, जिसमें उन्न्त वास्तुकला के नमूने आज भी गोंडवाना की समृद्धि के प्रतीक हैं। सिंगौरगढ़ का किला, हाथी दरवाजा, संग्राम सागर का बाजनामठ, पचमठा गढ़ा के मंदिर समूह, रामनगर का मोती महल, विष्णु मंदिर, भागवत राय की कोठी, बाघेला रानी का महल, बादल महल, मंडला का राजराजेश्वरी मंदिर के अलावा गोंडवाना के अगिनत मंदिर गोंड राजाओं की धर्मपरायणता के पर्याय हैं।

रामनगर की विरासत के क्या कहने : राजा हृदयशाह ने नर्मदा तट पर स्थित रामनगर को मंडला की राजधानी बनाया था। मोती महल गोंडवाना के सुंदरतम महलों में से एक है। आयताकार यह भवन 63 मीटर लंबा और 60 मीटर चौड़ा है। मध्य में आंगन पचास मीटर लंबा और 46 मीटर चौड़ा है। आंगन में 12 मीटर वर्ग का तरणताल है, जिसमें फव्वारे लगे हैं। भवन के सामने चार मंजिल और बाकी महल तीन मंजिला है। महल में अनेक कमरे हैं, जहां तक भूल भुलैया रास्तों से ही पहुंचा जा सकता है। महल की दीवारें मोटी, गारे का प्लास्टर और दरवाजों का निर्माण हिंदू शैली में है। कलशयुक्त गुम्बद, संस्कृत में गढ़े शिलालेख राजाओं के धर्मनिष्ठ होने के प्रमाण हैं। मोती महल के दक्षिण में एक मंदिर है, जिसका निर्माण 1667 में हुआ, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। इसमें विष्णु, शिव, गणेश, दुर्गा और सूर्य की मूर्तियां प्रतिष्ठित कराई गईं हैं। भागवत राय की कोठी की बनावट उत्कृष्ट है। दो किमी दूर बेगम महल आज भी सुरक्षित है।

प्रख्यात तांत्रिक मठ : राजा संग्रामशाह ने 1530 के आसपास गढ़ा स्थित संग्रामसागर के तट पर तांत्रिक मठ का निर्माण कराया। पांच सदी बीतने के बाद भी मंदिर ज्यों का त्यों का। विशाल गुम्बद वाला बाजनामठ अपने वास्तुशिल्प का अनोखा प्रमाण है। इस मठ का निर्माण भैरव की उपासना के लिए कराया था। तंत्र साधना और उससे प्राप्त होने वाली सिद्धियों के लिए बाजनामठ की समकालीन दूर-दूर की रियासतों तक रही। संग्राम सागर के बीचों-बीच आमखास महल के अवशेष आज भी हैं। इस भवन का निर्माण राजकाज की गुप्त रणनीतियां बनाने के लिए किया गया था। यहां तक नौकाओं के द्वारा ही पहुंचा जा सकता है।

पचमठा के मंदिर समूह : गढ़ा पचमठा में अनेक मंदिरों का निर्माण गोंडकाल में हुआ। 1603 में स्वामी चतुर्भुजदास का बनवाया राधाकृष्ण मंदिर अब अपने मूल रूप में नहीं है। इसका जीर्णोद्धार हो चुका है। राधाकृष्ण मंदिर के निकट अनेक शिव मंदिर है, जिनका निर्माण गोंड राजाओं के द्वारा कराया गया।

मंडला का राजराजेश्वरी मंदिर : राजा नरेंद्र शाह ने 1698 में मंडला को गोंडवाना की राजधानी बनाया था। मंडला में हुए निरंतर आक्रमण के बाद ध्वस्त किला के अवशेष आज भी हैं। दक्षिण की ओर दो मंदिरों के अवशेष हैं। यहां स्थित राजा नरेंद्रशाह द्वारा बनवाया गया राजराजेश्वरी और शिवजी का मंदिर आज भी सुरक्षित है।

गौरवशाली अतीत का साक्षी सिंगौरगढ़ : दमोह मार्ग पर सिंग्रामपुर में भांडेर पर्वत श्रृंखला में सिंगौरगढ़ का किला स्थित है। किला का पहुंच मार्ग इतना दुर्गम है कि यहां तक पहुंचना ही कठिन है। किला पहाड़ी पर स्थित है, जबकि प्रवेशद्वार जिसे हाथी दरवाजा कहा जाता, वह विशालता को समेटे हुए है। हाथी दरवाजे के दोनों ओर परकोटा है, जो किला समेत आसपास की पहाड़ियों को घेरे हुए है। हाथी दरवाजा के किनारे से बनी सीढ़ियां किला तक पहुंचाती हैं। किला की छत अब नहीं रही, जबकि पत्थर के कुछ दरवाजे लगे हैं। किले की दीवारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियों की नक्काशी की गई है। इतनी ऊंचाई पर बरसाती पानी को रोकने के दो छोटे तालाबों के अवशेष हैं, जिसमें एक पानी पेयजल, जबकि दूसरे का पानी निस्तार में उपयोग होता था।

गोंड राजा विरासत के संरक्षक : देश की जो सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत है, गोंड राजा उसके संरक्षक थे। उन्होंने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। परिस्थितियां चाहे जैसी भी रहीं हों, लेकिन गोंड राजाओं ने अपने स्वाभिमान पर आंच नहीं आने दी। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने इस परंपरा को कायम रखा, यह समूचे देश के लिए गौरव की बात है।

-डॉ. आनंद सिंह राणा, इतिहासकार

Posted By: Brajesh Shukla

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