जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। शहर के अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता व ओपी यादव ने भारतीय न्यायपालिका के सम्मान में मोर्चा खोल दिया है। इसके तहत आपराधिक अवमानना कार्रवाई की मांग संबंधी याचिका दायर की गई है, जिसे सुनवाई के लिए मंजूर भी कर लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में 17 भूतपूर्व न्यायाधीशों और 65 आइएएस, आइपीएस व आइएफएस के विरुद्ध आपराधिक अवमानना पर सुनवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने डेमोक्रेटिक लायर्स फोरम, जबलपुर के सचिव अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता व अध्यक्ष ओपी यादव की अवमानना याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है। मामला सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत व जेबी पार्दीवाला के विरुद्ध पत्र लिखने से संबंधित है। इन भूतपूर्व न्यायाधीशों व अधिकारियों ने ओपन कोर्ट में हुई बहस के दौरान इन दोनों न्यायाधीशों ने जो प्रश्नोत्तर किए थे, उनकी निंदा करते हुए पत्र लिखा था। इसी पत्र को आधार बनाकर इन सभी के विरुद्ध आपराधिक अवमानना कार्रवाई पर बल दिया गया है। प्रत्येक अवमाननाकर्ता पर 10-10 लाख का जुर्माना लगाने के अलावा एक दिन कोर्ट में खड़े होने की सजा चाही गई है। साथ ही इंटरनेट व मुख्यधारा के मीडिया के लिए न्यायाधीशों के संबंध में प्रकाशन के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने पर भी बल दिया गया है।

अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता ने यह जानकारी देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना याचिका में यही कहा गया है कि पत्र के जरिये न्यायपालिका को अपमानित करने का आलोचनीय प्रयास किया गया था। यह रवैया आपराधिक अवमानना की परिधि में आता है। यह जांच का विषय है कि एक विषय को लेकर इतने सारे लोग कैसे एकजुट हो गए। पत्र पर हस्ताक्षर कहां किए गए। कहीं इसके पीछे सुनियोजित षडयंत्र तो नहीं था। यह पत्र प्रायोजित हो नहीं था। बिना मामले के तथ्यों को पूरी तरह जाने खुला पत्र कैसे लिख दिया गया।

अटार्नी जनरल आफ इंडिया से भी अनुमति मांगी :

अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने की प्रक्रिया में प्रविधान के अनुरूप अटार्नी जनरल आफ इंडिया से अनुमति मांगने की प्रक्रिया अपनाई गई है।अवमानना याचिका में उल्लेख किया गया है कि खुले पत्र को सुनियोजित तरीके से प्रकाश में लाकर इंटरनेट मीडिया के साथ-साथ समाचार पत्रों व इलेक्ट्रानिक मीडिया तक पहुंचाया गया। इससे न्यायपालिका की संवैधानिक स्वतंत्रता बाधित हुई। एक तरह से यह रवैया न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का कुत्सित प्रयास था। इस तरह के संवैधानिक हरकत को गंभीरता से लेकर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई होनी चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश के आदेश पर पंजीबद्ध हुई याचिका :

अधिवक्ता गुप्ता ने बताया कि पूर्व में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने उनकी याचिका लेने से इन्कार कर दिया था। लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश से रजिस्ट्री को यह अवमानना याचिका लेने के लिए आदेशित करने का निवेदन किया गया। जिसके बाद उनके आदेश पर यह अवमानना याचिका पंजीबद्ध की गई। साथ ही याचिकाकर्ता को अग्रिम कार्रवाई व तैयारी के लिए एक माह का समय दिया गया। याचिका में भारत शासन, विधि व न्याय मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया गया है।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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