जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। स्वाशासी कॉलेजों में कार्यरत स्वावित्तीय पाठ्यक्रम के अतिथि विद्वानों को फिलहाल नौकरी से अलग कर दिया गया है। विभागीय स्तर पर इसे सत्र ब्रेक कहा जा रहा है लेकिन अतिथि विद्वान संकट काल में नौकरी छूटने से परेशान है वो मुख्यमंत्री समेत प्रधानमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखकर दखल की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि रिक्त पदों के विरुद्ध नियुक्त अतिथि विद्वानों को जब 12 माह वेतन भुगतान किया जाता है तो फिर उनके साथ भेदभाव क्यों?

बता दे कि कॉलेजों में नियुक्ति अतिथि विद्वानों को 12 माह के लिए नियुक्ति किया जाता है उनका वेतन भी 30 हजार रुपये शासन से फिक्स है। इसके लिए शासन स्तर पर अनुदान मिलता है लेकिन स्वावित्तीय पाठ्यक्रम में पढ़ाने वाले शिक्षकों का वेतन भुगतान फीस के माध्यम से संस्था को करना होता है ऐसे में उनके लिए सत्र ब्रेक अप्रैल में हर साल दिया जाता है। इस संबंध में महाकोशल कॉलेज की प्राचार्य डॉ. आभा पांडे ने कहा कि अतिथि​ विद्वानों को हर साल 30 अप्रैल को ब्रेक दिया जाता है। नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होते ही उन्हें दोबारा नियुक्त किया जाता है। उनके अनुसार ये परम्परा पुरानी है। अतिथि विद्वान कोरोना काल से इसे जोड़कर लाभ लेना चाह रहे हैं। वहीं कोरोना संक्रमण का हवाला देकर कई अतिथि विद्वानों का कहना है कि महामारी के दौर में जब उन्हें आर्थिक तंगी है ऐसे वक्त में नौकरी से हटाना उनके परिवार के लिए परेशानी भरा है। उन्होंने कहा कि जब सामान्य कोर्स में पढ़ाने वाले अतिथि विद्वानों को 12 माह के लिए ज्यादा वेतन दिया जाता है तो स्वावित्तीय कोर्स में पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जा रहा है। सभी शासकीय कॉलेजों में फिलहाल अतिथि विद्वानों को हटाया गया है।

Posted By: Ravindra Suhane

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