जबलपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

अयोध्या में राममंदिर निर्माण का भूमिपूजन कार्यक्रम 5 अगस्त को अयोध्या में रामलला की जन्मस्थली पर आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में देश भर के 200 साधु-संतों को भी आमंत्रित किया गया है। खास बात यह है कि मध्यप्रदेश के जबलपुर से दो संत जो राममंदिर की धार्मिक और न्यायिक प्रक्रिया में हमेशा साथ रहे, उन्हें अयोध्या शुभारंभ कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया है। इनमें महामंडलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि और जगतगुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य महाराज सोमवार को सुबह अयोध्या के लिए प्रस्थान करेंगे। इनके अलावा मंडला जिले के बीजाडांडी से संत दिगम्बर दास को भी आमंत्रण आया है।

हमेशा रामलला के लिए जुटे रहेः

विश्व हिंदू परिषद के जरिए दोनों ही संत प्रारंभिक दौर से ही रामजानकी रथ यात्रा से लेकर शिलापूजन, देशव्यापी श्रीराम महायज्ञ, श्रीराम ज्योति यात्रा, श्रीराम चरण पादुका पूजन, श्रीरामरंग यात्रा, श्रीराम नाम जप यज्ञ, हनुमत यज्ञ के अलावा कारसेवा तक में शामिल रहे। पहली बार कारसेवा की घोषणा के बाद स्वामी अखिलेश्वरानंद महाराज और डॉ. श्यामदेवाचार्य महाराज को भी दायित्व सौंपे गए।

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कारसेवकों को भेजने की मिली थी जिम्मेदारी

राम मंदिर आंदोलन और जनजागरण की यादों को ताजा करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि ने बताया कि आंदोलन में हमेशा वरिष्ठ संतों के साथ जुड़ा रहा। जब भी मुझे दायित्व दिया गया उसके अनुसार कार्य किया। जब 9 नवंबर 1989 के समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। शिलान्यास की तिथि घोषित हुई तो हमें बताया गया कि हम जहां भूमिपूजन करेंगे वह स्थल विवादित है। सभी निराश होने लगे और उहापोह की स्थिति बनने लगी। लेकिन उसी समय तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह एक पत्र लेकर पहुंचे कि जो स्थल विवादित बताया जा रहा है फिलहाल वह राजस्व और अन्य विभागों के लिए विवादित नहीं है और शिलान्यास हो गया। इसके बाद लगातार मप्र और छत्तीसगढ़ के जिलों में मैंने सम्मेलन और गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुआ। 1992 में कारसेवा शुरू हुई तो मुझे कारसेवकों को भेजने का दायित्व मिला। जिसके बाद मैंने कारसेवकों को भेजने की व्यवस्था की।

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आज भी ताजा हैं राम मंदिर आंदोलन की यादें

राम मंदिर आंदोलन के बारे में चर्चा करते हुए जगतगुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य महाराज ने बताया कि बात वर्ष 1983 की है जब मैं भी इस आंदोलन से जुड़ गया। परमहंस महाराज से जुड़ने के बाद आंदोलन के लिए जगह-जगह सम्मेलन और गोष्ठी होने लगी और मैं आयोजनों में शामिल होता रहा। चर्चा करते हुए महाराज जी ने बताया कि एक बार की बात है जब परमहंस महाराज ने राम मंदिर न बनने पर आत्मदाह की घोषणा कर दी। तब अन्य संतों ने कहा कि आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे। राम मंदिर निर्माण के लिए हम आपके साथ हैं। 1984 में जब सभी दिल्ली में आंदोलन के लिए जा रहे थे तभी लखनऊ पहुंचने पर पता चला कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। इसके बाद सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए। इसके एक साल बाद फिर हम सभी आंदोलन में जुट गए। जब मंदिर का ताला खुला था तो दूसरे दिन ही परमहंस महाराज, स्वामी वासुदेवानंद के साथ भगवान के दर्शन करने गए थे।

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