कमलेश पांडेय

आज शरद पूर्णिमा की रात है। आलौकिक आध्यात्मिक जादुई रात। जादू शीत की आहट के साथ तन में जागते रोमांच का। मन में हलचल मचाती कोमल भावनाओं का। चंद्रमा हमारे निकट होगा। पृथ्वी के सबसे निकट और अपनी सभी सोलह कलाओं से परिपूर्ण। मन को उद्वेलित करता। रात के चांद पर आंखें गड़ा दीजिए। ऐसा लगेगा जैसे आकाश से गीले ख़्वाबों में डूबा कोई चेहरा हसरत से ताक रहा है। जैसे दूध-मलाई का बड़ा-सा छत्ता किसी ने अनंत में टांग दिया हो।

शरद पूर्णिमा को लोग कौमुदी महोत्सव भी कहते हैं। रास पूर्णिमा भी। यह प्रेमियों की रात है। प्रेम को समर्पित भावनाओं का एकांत। यह वही रात थी जब लीलाधारी श्रीकृष्ण ने ब्रज की गोपियों के साथ मधुबन में महारास रचाया था। कदंब के पेड़ों से झरती चांदनी के नीचे कृष्ण की बांसुरी की मोहक तान, गोपियों के आत्मिक समर्पण और सामूहिक नृत्य का अनोखा संगम। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत झरता है जिसमें स्नान कर प्रेमी जन्म-जन्मान्तर के अटूट बंधन में बंध जाते हैं। यह मान्यता झूठी हो तब भी जादू की इस नदी में जीवन में एक बार स्नान तो बनता ही बनता है।

उत्तर भारत में आज की रात गुड़ में बनी खीर को शुभ्र, शीतल चांदनी में देर तक भिगोकर खाने की परंपरा है। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की चांदनी के असर से खीर में औषधीय गुण आ जाते हैं। बचपन में हममें से बहुत लोगों ने गांव में कदंब के वृक्ष के नीचे बैठकर चांदनी में नहाई शीतल खीर भी खाई होगी और धमाल भी मचाया होगा। जवानी में जबतक इस रात के पीछे का रूमान समझ में आया तब तक कदंब के अधिकांश पेड़ लुप्त हो चुके थे। आकाश का धवल चांद अकेला पड़ चुका था। उसकी जगह शहरों की चकाचौंध ने ले ली थी। बचपन के बाद फिर कभी मधुबन वाला वह जादुई एकांत भले ही आपने महसूस न किया हो, लेकिन एक बार इस चांदनी के सुकून में बैठना तो बनता ही है।

जो लोग आज भी गांवों में हैं वह भी इस रात का अर्थ भूलते जा रहे हैं। आज फिर शरद पूर्णिमा की रात है। कदंब से छनकर आती चांदनी का तिलिस्म और प्रेम का एकांत न सही, शीतल चांदनी में नहाई घर की अकेली छत तो है। खीर का कटोरा चांदनी के हवाले करिये और बगल में एक चादर बिछाकर लेट जाइए। देह पर झरती चांदनी और सरकती हवा को देर तक आंखें मूंदकर महसूस करिये। अवसाद के इस दौर में, सच में सुकून के पल आप जी लेंगे।

Posted By: Nai Dunia News Network

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