जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, एनजीटी ने राज्य सरकार से पूछा है कि शहरी क्षेत्र से डेयरियों को बाहर शिफ्ट करने के मामले में राज्य शासन की ओर से जवाब क्यों नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है। एनजीटी के न्यायिक सदस्य शिव कुमार सिंह व एक्सपर्ट मेंबर डा. अरुण कुमार वर्मा की युगलपीठ ने सरकार को हर हाल में चार सप्ताह में जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। मामले पर अगली सुनवाई 19 जनवरी, 2022 को निर्धारित की गई है।

नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच, जबलपुर के प्रांताध्यक्ष डा. पीजी नाजपांडे व नयागांव, जबलपुर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता रजत भार्गव ने एनजीटी में आवेदन प्रस्तुत कर मांग की थी कि जबलपुर नगर निगम क्षेत्र में स्थित डेयरियों को बाहर शिफ्ट किया जाए।

आवेदन में कहा गया कि डेयरियों से निकलने वाले प्रदूषण से डेंगू और मलेरिया फैल रहा है। इसके पहले एक अक्टूबर को एनजीटी ने सरकार को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने कहा था। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से कई बार प्रयास किए गए ताकि शासन जवाब पेश करे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

शहर में हैं 450 डेयरियां : आवेदकों की ओर से अधिवक्ता प्रभात यादव ने अवगत कराया कि जबलपुर नगर निगम क्षेत्र में छोटी-बड़ी 450 डेयरियां संचालित हैं। यहां तक कि पचपेढ़ी जैसे पॉश इलाके में भी डेयरियां चल रही हैं। इनसे निकलने वाला गंदा पानी, गोबर और अन्य अपशिष्ट यहां-वहां फेंका जाता है, जिससे बीमारियां होती हैं।

हाई कोर्ट ने पूछा-विभागीय जांच लंबित होने पर क्यों नहीं दे रहे 90 फीसद पेंशन का लाभ : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने विभागीय जांच लंबित होने पर 90 फीसद पेंशन का लाभ न दिए जाने के रवैये पर जवाब-तलब कर लिया है। इस सिलसिले में आइजी खरगौन व एसपी खंडवा को नोटिस जारी किए गए हैं।

न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता दमोह निवासी हिमांशु धर दि्वेदी की ओर से अधिवक्ता भूपेंद्र कुमार शुक्ला ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता 2020 में इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुआ। लेकिन उसके खिलाफ विभागीय जांच लंबित होने के आधार पर महज 75 फीसद पेंशन प्रदान की जा रही है साथ ही सेवानिवृत्ति संबंधी अन्य लाभ रोक लिए गए हैं। बावजूद इसके कि मध्य प्रदेश पेंशन नियम के तहत विभागीय जांच लंबित होने की सूरत में भी 90 फीसद पेंशन दिए जाने का प्रविधान है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट क डा.हीरालाल का न्यायदृष्टांत मार्गदर्शी है।इस रवैये के खिलाफ विभागीय स्तर पर सुनवाई न होने के कारण हाई कोर्ट आना पड़ा।

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