कॉलम- कह गए साहब- अतुल शुक्ला, जबलपुर, नईदुनिया। साहब को भी पसंद है फिजूल खर्ची- बात बचत की हो तो समझ आती है, लेकिन जब बचत की आड़ में फिजूल खर्ची चल रही हो तो किसी ने किसी की आंख का कंकड़ भी बन जाती है। यह बात जबलपुर रेलवे मुख्यालय पर सही बैठती है। रेलवे ने बचत के लिए यात्रियों की सुविधा बंद कर दी, टीटीई के भत्ते रोक दिए। यहां तक की स्टेशन की सफाई के बजट तक में कटौती कर दी, लेकिन जब बात जनप्रतिनिधियों को खुश कर वाहवाही लूटने की आई तो रेल मंडल ने अपना खजाना खोल दिया। भले ही रेलवे का यह आयोजन यात्रियों की सुविधा-साधन की समीक्षा को लेकर था, लेकिन मंडल ने मुख्यालय के साहब के आदेशों का पालन करते हुए शहर की बड़ी होटल में जनप्रतिनिधियों की जमकर आवभगत की। जबकि रेलवे के पास जनप्रतिनिधियों के इस आयोजन को करने के लिए वो हर व्यवस्था मौजूद थी, जिसके लिए उसने अच्छा खासा मोटा बिल चुकाया।

छोटे साहब का चला गया राज और पाठ:

गीता में सच ही लिखा है कि जो आज आपका है, वो कल किसी और का होगा। इसलिए मोहमाया में फंसकर मन दुखी नहीं करना चाहिए। इन दिनों वेटरनरी विश्वविद्यालय में छोटे साहब को हर कोई यही सांत्वना दे रहे हैं। हुआ यह है कि इन साहब के पास राज और पाठ दोनों ही चला गया है। कल तक साहब कालेज के मुखिया के मुखिया हुआ करते थे। उन पर राज भी किया करते थे, लेकिन यह जिम्मेदारी मुख्यालय से दूर के एक कालेज के मुखिया को सौंप दी है, जिससे इन दिनों साहब उदास हैं। वहीं दूसरी तरफ विद्यार्थियों को शोध का पाठ पढ़ाने की भी जिम्मेदारी भी इन पर ही थी, लेकिन यह जिम्मेदारी का भार भी इनके कंधों से उठाकर दूसरे कंधों पर रख दिया है। यही वजह है कि हर कोई अब पीठ पीछे कह रहा है कि साहब का राज और पाठ, दोनों चला गया।

टारगेट पूरा करने जहां मिले, वहीं धर लो:

कोरोना संक्रमण से भले ही कोई बीमार न हो, लेकिन संक्रमण मुक्त बनाने की जिम्मेदारी के भार से जरूर बीमार हो जाएगा। जिला प्रशासन में इन दिनों संक्रमण मुक्त शहर और गांव बनाने के लिए जमकर अभियान चल रहा है। इस अभियान के जिम्मेदारों को कोरोना की दूसरी वैक्सीन से वंचित लोगों को तलाशने और उन्हें वैक्सीन लगाने की जिम्मेदारी सौंपी है। इसका निर्वाह करते हुए वह शहर और गांव की गलियों में घूम रहे हैं तो कभी अस्पताल जाकर लिस्ट ले रहे हैं। इतना ही नहीं इस काम के बीच साहब का बुलावा आ जाए तो सब काम छोड़कर उन तक पहुंचाने का काम भी कर रहे है। इस अभियान को जिम्मेदारी अब त्रस्त अभियान कहने लगे हैं, लेकिन टारगेट को हर हाल में पूरा करना है। इसलिए जिम्मेदारों को जहां भी कोई कोरोना संक्रमण वैक्सीन से वंचित दिखता है, वह वहीं रूककर इंजेक्शन की सुई चुभा देते हैं।

रात हमारी, दुकान हमारी, हम है आबकारी :

बात तो सच है कि जिसे, जो जिम्मेदारी सौंपी जाती है, कभी-कभार वह उस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेता है। यह बात शहर में अवैध शराब को रोकने की जिम्मेदारी संभालने वाले जिम्मेदारों पर सटीक बैठती है। शहर में कई ऐसे इलाके हैं, जहां शराब बेचने की जिम्मेदारी निभाने वाले तय समय के बाद भी अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी ने निभाते हैं। भले ही वजह ज्यादा मुनाफा कमाने की हो, लेकिन इस आड़ में कई अपने झाड़ भी काट रहे हैं। खासतौर पर शहर के अधारताल और महाराजपुर की शराब दुकानों में तैनात जवान इन दिनों देर रात तक अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं। उनके लिए समय कोई मायने नहींं रखता। विभाग के कुछ लोग उनके इस काम को आत्मबल देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। खरीददारों को पता है कि रात में कितने बजे भी यहां आए उनकी प्यास हर हाल में बुझ ही जाएगी।

Posted By: Brajesh Shukla

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