रामकृष्ण परमहंस पांडेय, जबलपुर। भूकंप के लिए संवेदनशील जिले में 70 फीसद पक्के भवनों के निर्माण में भूकंपरोधी तकनीक को हाशिए पर रख दिया गया है। ऐसे भवन इंजीनियर की निगरानी के बगैर बनाए जाते हैं। यह मनमानी भविष्य में गंभीर खतरे की ओर इशारा करती है। 24 साल पहले विनाशकारी भूकंप झेल चुके इस जिले में भूकंपरोधी तकनीक की निगरानी के लिए सरकारी तौर पर कोई व्यवस्था नहीं है। 22 मई 1997 को छह रिक्टर तीव्रता वाले भूंकप ने तबाही मचाई थी। जिसमें कोसमघाट गांव तबाह हो गया था। जिलेभर में 41 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। हजारों की तादात में शासकीय व निजी भवन क्षतिग्रस्त हुए थे। 1997 के बाद भी करीब तीन बार जिले में भूकंप के झटके महसूस किए जा चुके हैं। हैरानी की बात है कि कोसमघाट गांव में भी अधिकतर भवनों के निर्माण में भूकंपरोधी तकनीक का उपयोग नहीं किया गया। इतना ही नहीं भूकंप की त्रासदी के बाद सरकारी तौर पर बनाए गए कई मकान दरकने लगे हैं। कुछ मकानों में लोगाें ने रहना छोड़ दिया है। 1997 की त्रासदी के बाद जबलपुर को भूकंप के जोन-3 में रखा गया है। जिसका आशय है कि यहां 6-7 रिक्टर तीव्रता वाले भूकंप की आशंका बनी रहती है। आपदा प्रबंधन की सूची में जबलपुर देश के 38 अति संवेदनशील शहरों में शामिल किया गया है।

कोसमघाट लाइव

कोसमघाट के तमाम नागरिक आज भी 22 मई की विनाशकारी रात को याद कर सहम जाते हैं। वे मानते हैं कि उनका गांव भूकंप के लिए संवेदनशील है, परंतु अपनी माटी से मोह के कारण वे गांव छोड़कर कहीं और बसना नहीं चाहते। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 के किनारे बसे इस गांव में मतदाताओं की संख्या 450 तथा घरों की संख्या 125 से ज्यादा है। अधिकतर भवनों के निर्माण में भूकंपरोधी तकनीक नजर नहीं आती। गांव के तमाम नागरिक प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्जवला योजना, शौचालय निर्माण योजना से वंचित हैं। कोसमघाट निवासी दादूराम सेन 83 वर्ष समेत तमाम नागरिकों विपदा की उस घड़ी में केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल के योगदान को नहीं भूल पाते। जिन्होंने भोजन व आश्रय स्थल की व्यवस्था के साथ आर्थिक मदद की थी। उस दौरान मिली सरकारी सहायता को नाकाफी बताते हैं। आम मजदूर की तरह उन्होंने घरों का मलवा हटाने में सहायता की थी।

श्रमदानी सम्मान समारोह आज

भूकंप के 25 साल पूरे होने पर कोसमघाट में 22 मई को श्रमदानी सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस दौरान केंद्रीय राज्यमंत्री बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहेंगे। कार्यक्रम में भूकंप के दौरान श्रमदान करने वालों को सम्मानित किया जाएगा।

आंखों के सामने ढह गया था मकान

सुबह आंख खुली तो कुछ देर बाद ही जमीन हिलने लगी। कुछ देर बाद घर की दीवारों में दरार आ गई और देखते ही देखते पूरा मकान ढह गया। मैं गौशाला की तरफ भागा। जहां बंधे 14 मवेशियों को बाहर निकाला। गौशाला भी ढह चुकी थी। कुछ मवेशी घायल हो गए थे। कुछ ही देर में पूरा गांव तबाह हो चुका था।-लखनलाल यादव, 80 वर्ष, स्थानीय निवासी

जमीन के साथ कांप रहा था दिल

गर्मी के कारण मैं कच्चे मकान से निकलकर परछी में सो रहा था। सुबह-सुबह अचानक जमीन हिलने लगी। कुछ समझ पाता तब तक चारों ओर से शोर सुनाई देने लगा। लोग चीखने चिल्लाने लगे। एक-एक कर गांव के सभी घर जमीन पर आ गए। चारों ओर मलवा फैल गया। गांव से बाहर निकलने के रास्ते बंद हो गए थे। जमीन थर्रा रही थी, दिल कांप रहा था।-सीताराम गोंड, 65 वर्ष, स्थानीय निवासी

कुछ नहीं बचा था, सब गड़ गया था

गांव में कुछ नहीं बचा था। सब चकनाचूर हो गया था, जमीन में गड़ गया था। घरों में रखे कपड़े, बर्तन तक सलामत नहीं मिले थे। सहायता न मिलती तो ग्रामीण दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए थे। पूरे गांव को तबाह होने में एक मिनट का भी समय नहीं लगा था। त्रासदी अपनी आंखों से देखी थी, जिसे याद कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।-हृदय भूमिया, 60 वर्ष, स्थानीय निवासी

फैक्ट फाइल

-22 मई 1997 को जबलपुर में आया था भूकंप।

-छह रिक्टर तीव्रता वाले भूकंप ने मचाई थी तबाही।

-भूकंप का असर आसपास के जिलों में भी पड़ा था।

-भूकंप का केंद्र बिंदु कोसमघाट गांव तबाह हो गया था।

-जिले भर में हजारों घर क्षतिग्रस्त हुए थे।

-41 लोगों की मौत हुई थी।

यहां भवनों के निर्माण में कोताही

जबलपुर भूकंप के लिहाज से संवेदनशील है। भवनों का निर्माण कुशल इंजीनियर की देखरेख में किया जाना चाहिए। परंतु करीब 70 फीसद भवनों के निर्माण में कोताही की जा रही है। भूकंपरोधी तकनीक का पालन नहीं किया जा रहा है।-संजय वर्मा, इंजीनियर, प्रेक्टिशिंग इंजीनियर्स एसोसिएशन

अमले की कमी

नगर निगम द्वारा नक्शा पास करने के दौरान संबंधित आर्कीटेक्ट, इंजीनियर से अंडरटेकिंग ली जाती है। ताकी उनकी देखरेख में भूकंपरोधी तकनीक से निर्माण कार्य किया जा सके। अमले की कमी के कारण भौतिक रूप से भवनों का परीक्षण नहीं किया जाता है।-राजेंद्र गुप्ता, नक्शा विभाग प्रभारी, नगर निगम

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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