जबलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

खेती में नए-नए अनुसंधान शुरू हो गए हैं। खेतों को रसायनिक खाद से बचाने के लिए जैविक खाद का प्रयोग किया जा रहा है, लेकिन जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और शोध के विद्यार्थियों ने जैविक खेती से एक कदम आगे आकर प्राकृतिक खेती पर काम करना शुरू कर दिया है।

कृषि विवि के वैज्ञानिक इस समय प्राकृतिक खेती के फायदे और नुकसान जानने के लिए अनुसंधान कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने विवि के फार्म में 5 एकड़ के खेत पर प्राकृतिक खेती करना शुरू की है, जिसमें गाय के गोबर और गोमूत्र के साथ वनस्पति को मिलाकर खेती में इसका उपयोग कर रहे हैं।

क्या है प्राकृतिक खेती

अभी तक खेती में उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद का उपयोग होता है। रासायनिक खाद के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए जैविक खाद से खेती करना शुरू की गई। अब जनेकृविवि के वैज्ञानिकों ने जैविक खाद से एक कदम आगे बढ़कर प्राकृतिक तरीके से खेती करने के लिए अनुसंधान शुरू किया है। इसमें देशी गाय का मुख्य काम है। उसके गोबर, गोमूत्र से लेकर पेड़-पौधों से मिलने वाली वनस्पतियों से खाद, दवाई और हार्मोन्स टॉनिक बनाई जाएगी, जो खेती में उपयोग होगी।

बीज से लेकर मिट्टी तक का उपचार

कृषि वैज्ञानिक डॉ.आरपी साहू बताते हैं कि विवि द्वारा प्राकृतिक खेती पर अनुसंधान किया है। इसमें खेती के दौरान बीज से लेकर मिट्टी, तरल पदार्थो का छिंड़काव और उनके उपचार में प्राकृतिक साधनों का उपयोग किया है, जैसे की बीजाअमुत, जिसमें बीजों का प्राकृतिक उपचार होता है। जीवामृत में खेत की मिट्टी का उपचार किया जाता है। घनजीवामृत में खेती में डाले जाने वाली तरल पदार्थ का उपचार होता है। इसके अलावा ब्रम्हास्त्र, अग्निास्त्र, सप्ताधान्याकुर, नीमास्त्र, खट्टीलस्सी जैसे प्राकृतिक तरीकों से खेती हो रही है।

दोनों तरीके के परिणाम पर नजर

विवि ने प्राकृतिक खेती के साथ साधारण खेती भी की है, ताकि दोनों में होने वाले अंतर का पता लगाया जा सके। हालांकि इसकी शुरूआत नवम्बर 2019 में की गई, जिस पर अभी अनुसंधान चल रहा है। कृषि वैज्ञानिक डॉएलएस शेखावत बताते हैं कि इन प्राकृतिक घटक के उपयोग से खेती में रसायनिक खाद, दवाईयों की जरूरत न के बराबर रहती है।

वर्जन-

कृषि विवि के वैज्ञानिकों ने जैविक खेती से एक कदम आगे बढ़कर प्राकृतिक खेती करने के लिए अनुसंधान शुरू कर दिया है। इसके उपयोग से न सिर्फ इंसान बल्कि पशुओं में किसी तरह का नुकसान नहीं होगा।

प्रो.प्रदीप बिसेन, कुलपति, जनेकृविवि

Posted By: Nai Dunia News Network